दास एक गोपनीय बात बोल रहा है, कौन सी अरदास कबूल होती है, मंजूर होती है ? ... तब ये परमपिता परमात्मा उसकी बात को मान लेता है, वैदिक कॉलोनी हाउसिंग बोर्ड में हरियाणा अंबाला से पधारे संत निरंकारी मिशन के महात्मा श्री बलवान सिंह जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी ( मुरली पृथ्यानी ) अक्सर एक प्रश्न उठता है कि कौन सी अरदास कबूल होती है, मंजूर होती है ? दास एक गोपनीय बात बोल रहा है। मंदिरों में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में, चर्चों में, सब जगह अरदासें होती हैं। हर अरदास थोड़ी न कबूल होती है ? अब, कौन सी अरदास कबूल होती है ? किस स्थान पर बैठ करके अरदास कबूल होती है ? कोई गुरु सिख, कोई भगत कोई संत इस अवस्था पर आकर के बैठ गया, वृत्ति के द्वारा, उसकी वृत्ति, सुरुती, ध्यान, निरंकार के अंदर है। इसी को चौथा पद बोला गया है इसी को तुरिया पद बोला गया है, इसी को परम पद बोला गया है, इसी को असल ठिकाना बोला गया है, इसी को बेगमपुर बोला गया है, इसी को ही सतलोक, सचखंड, भिन्न-भिन्न नामों से संतों ने इसको उच्चारित किया, अगर कोई संत यहां बैठ करके किसी के बारे में अरदास कर दे, उसकी किस्मत में नहीं भी है ना, तब ये परमपिता परमात्मा उसकी बात को मान लेता है। कोई अगर गुरु सिख संत इस अवस्था पर आ करके बैठ करके किसी के बारे में अरदास करता है, पारिवारिक है, व्यापारिक है, सामाजिक है, आर्थिक है, शारीरिक है, वो कबूल हो जाती है, मंजूर हो जाती है। उक्त विचार वैदिक कॉलोनी हाउसिंग बोर्ड में नववर्ष के अवसर पर 2 जनवरी को आयोजित सत्संग कार्यक्रम में हरियाणा अंबाला से पधारे संत निरंकारी मिशन के महात्मा श्री बलवान सिंह जी ने विशाल संख्या में उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
उन्होंने कहा सिमरन जाप रसना से करना यह भक्ति की पहली स्थिति है। हम सफर कर रहे हैं, गृहस्थ का कार्य कर रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, कुछ भी करें, अंदर वाला इस परमपिता परमात्मा का जाप करता रहता है, इसका उच्चारण करता रहता है। अध्यात्म में अगर कोई जीव, कोई इंसान आंतरिक जुबान के द्वारा या अजपा जाप की स्थिति को ग्रहण कर लेता है, तो बहुत अच्छी स्थिति मानी गई है। जब रसना का सिमरन पूरा होगा, फिर हृदय सिमरन करेगा। जब हृदय का सिमरन पूरा हो जाता है, तो हृदय भी सिमरन करना बंद कर देता है। फिर वृत्ति के द्वारा, सुरुती के द्वारा, ध्यान के द्वारा इसका सिमरन होता है। ये वृत्ति, सुरुती, ध्यान इस निराकार के अंदर ट्रैवल करती है। फिर, वो स्थिति आती है, "हथ कार वल, दिल यार वल।" हाथ, पैर से काम कर, चित निरंजन नाल। ये चित जो है ना, मन, ये निरंकार के साथ लगा रहता है। इसी के बारे में फिर संतों ने लिखा, "आठ पहर अराधिये, पूरण परमानंद।"
चरणों से लगा करके रखना। अब चरणों से लगाने का भी मतलब कुछ और है आध्यात्मिक भाषा में। चरणों से लगाने का मतलब ये है कि इसका तो रूप नहीं, रंग नहीं, फोटो नहीं, चित्र नहीं, आकार नहीं, निराकार है, तत्व स्वरूप है। इसे नमस्कार करो, इसे भोग लगाओ, भोग भी नहीं खाता। इसे वस्त्र भेंट करो, वस्त्र भी नहीं लेता। चरणों से लगाने का मतलब यह है कि इस परमपिता परमात्मा ने अपने हृदय में हमें स्थान दिया है। तो अरदास बनती है, प्रभु आपने हृदय में स्थान दिया है, अपने चरणों में स्थान दिया है, तो प्रभु ये चरणों में स्थान देकर ही रख। भगत, संत इस परमपिता परमात्मा के साथ अरदास करता है, प्रभु अपने प्यारों का संग देना। तेरे प्यारों के संग हमारा उठना बैठना हो, आहार, विहार हो, मिलवर्तन हो। तेरे प्यारों के संग बैठेंगे, तेरी कथा है, चर्चा है, गुणगान ही शोभन सुनेंगे, भक्ति की बातें होंगी, इसलिए अपने प्यारों का संग देना। सारा जहां तुझसे प्यार करता है प्रभु, तू भी किसी से प्यार करता होगा, प्रभु जिनसे तू प्यार करता है उस लिस्ट में हमारा नाम शामिल कर ले, यही अरदास है, मेरी प्रार्थना है।
शास्त्रों में जिक्र आया है कि शेषनाग अपनी सहस्त्र जीभाओं से इस निराकार परम पिता परमात्मा का, जब से ब्रहमांड बना है, सृष्टि बनी है, तब से निस दिन एक नया नाम उच्चारित करता है इसका। हम अपनी अक्ल, सोच, बुद्धिमता से, इसके कितने नाम दे सकते हैं ? हज़ार, दो हज़ार, तीन हज़ार, इससे ज्यादा नहीं ले जा सकते। यहां पर कहते हैं जब से ये ब्रहमांड बना है, सृष्टि बनी है, निस दिन एक नया नाम उच्चारित, और नाम का मतलब इसका गुण, परम पिता परमात्मा का गुण उच्चारित करता है। हिंदू भाई से बात हुई, कहते हैं ये सर्वव्यापी है। पत्ते-पत्ते में है, डाली-डाली में है, कण-कण में है। सिख साहिबान से बात हुई, कहते हैं जल में भी है, थल में भी है, मैय्यल में भी है। मैय्यल बोला जाता है इस धरती और नील गगन के बीच के स्थान को मैय्यल बोलते हैं। और जब मुस्लिम भाई से बात हुई, कहते हैं ये हाजिर- नाजिर है। हाजिर मतलब प्रेजेंट है, और नाज़िर मतलब हमारी सारी एक्टिविटी वॉच कर रहा है परम पिता परमात्मा। और क्रिश्चियन भाई कहते हैं गॉड इज़ ओमनिप्रेज़ेंट। ओमनिप्रेज़ेंट का मतलब होता है ऐसी ऐसी वस्तु जो सब जगह समान रूप से व्याप्त हो। पवित्र रामायण में इसी के बारे में संदर्भ आए हैं कि हरि व्यापक सर्वत्र समाना। कि जो ये हरि है, परम पिता परमात्मा सब जगह समान रूप से व्याप्त हैं। कहीं ज़्यादा, कहीं कम नहीं है। जितना मक्का मदीना में है, उतना हरिद्वार में है, जितना बनारस में है, उतना अमृतसर में है, जितना हमारे घर पर है, उतना हमारे ऑफिस में भी है। कहीं ज़्यादा या कम कहीं नहीं है। इसीलिए कहा हरि व्यापक सर्वत्र, सब जगह समान रूप से व्याप्त है, परम पिता परमात्मा।
संसार की जितनी भी शय है, जो भी हमारे जहन में यानी निरंकार को छोड़कर के, जो भी हमारे जहन में शय आ रही है, वस्तु आ रही है, सब काल के अधीन है, समय के अधीन है, सबकी एक अवधि है, सीमा है। एक समय के बाद वह भी फना हो जाती है, समाप्त हो जाती है। ये निरंकार परम पिता परमात्मा ही है जिसके बारे में हम रोज पढ़ते हैं कि, तीन काल है सत्य ये। हे परम पिता परमात्मा, तू तीनों कालों में सत्य है। सत्य का मतलब होता है जिसमें परिवर्तन नहीं होता है, उसे सत्य बोलते हैं। इसके अलावा जितनी शय, सब अपना रूप बदलेंगी, रंग बदलेंगी, स्थान बदलेंगी, स्थिति बदलेंगी, अवस्था बदलेंगी, छोटी से बड़ी, बड़ी से छोटी हो जाएगी, वैनिश हो जाएगी, कोई दूसरा रूप धारण कर लेंगी, लेकिन निरंकार परम पिता परमात्मा, अनादि काल से, सिंस बिगिनिंग ऑफ दिस यूनिवर्स। इस ब्रहमांड के बनने से पहले भी ये ऐसा ही था, जैसा अब है, और आगे भी ऐसा ही रहेगा। उसके अंदर रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं होता, निरंकार के अंदर। अध्यात्म में एक शब्द आता है, प्रलय, एक आता है महाप्रलय। प्रलय के अंदर क्या होता है? जितनी मैनमेड थिंग है ना, इंसान के द्वारा बनाई गई जितनी वस्तुएं हैं, वो प्रलय के अंदर फना हो जाती हैं, समाप्त हो जाती हैं। और महाप्रलय, जैसे मुस्लिम भाई कहते हैं, क़यामत का दिन। अंग्रेज लोग बोलते हैं लास्ट डे ऑफ़ द अर्थ, धरती का आखिरी दिन। महाप्रलय के अंदर जितनी भी गॉड मेड थिंग्स हैं, ईश्वर के द्वारा बनाई गई जितनी वस्तुएं हैं। इंसान के द्वारा नहीं, इंसान वाली तो प्रलय के अंदर फना हो जाती हैं, और महाप्रलय में क़यामत के दिन लास्ट डे ऑफ़ द अर्थ। जितनी भी शय इस परम पिता परमात्मा के द्वारा घड़ी गई है, सूरज है, चांद है, तारे हैं, धरती है, सब के सब वैनिश हो जाते हैं, फना हो जाते हैं। हर शय काल के अधीन है, समय के अधीन है। हर चीज़ की अवधि है, किसी चीज़ किसी की अवधि 2 साल है, 5 साल है, 10 साल है, 100 साल है, 1000 साल है, लाख वर्ष है, करोड़ वर्ष हैं। लेकिन, परम पिता परमात्मा है ना, ये कालातीत है। समय की सीमा से परे हैं, समय का इसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, निरंकार के ऊपर। पहले भी ऐसे ही था। जब यहाँ कुछ भी नहीं था, ये परम पिता परमात्मा तब भी ऐसा ही था, जैसा अब है। इसलिए सृष्टि का निर्माण किया, लोक पर लोक बनाए, खंड ब्रहमांड बनाए, पाताल पुरियां बनाई, अभी ऐसा ही है। और जब ये सारी सृष्टि फना हो जाएगी, महाप्रलय के अंदर तो ये परम पिता परमात्मा ही विराजमान रहता है।
परमपिता परमात्मा अतुल्य है। इसका किसी से कंपेरिजन नहीं हो सकता। कंपेरिजन तो तब होगा, जब इसके जैसा कोई दूसरा हो। इसके जैसा दूसरा ना कोई था, ना है, ना होगा, यह अपने आप में अकेला है परमपिता परमात्मा। यही है। इसलिए सारी सृष्टि के जीवों को पालने का ज़िम्मा ले रखा है। जल के जीव हैं, थल के जीव हैं, नभ के जीव हैं। यह 84 लाख योनियां हैं, चारों खानियां हैं: अंडज़, जेरज़, उद्भज, स्वेदज़। कुछ जीव अंडे से पैदा होते हैं, जिनकी संख्या इस जहान में सबसे ज़्यादा है। जेरज़ ज़मीन से, माँ के गर्भ से, माँ के पेट से पैदा होते हैं। यह भी एक खानी है। उद्भज हैं, धरती का सीना फाड़ करके पैदा होते हैं, जिसे वनस्पति बोलते हैं। यह भी एक खानी है। और स्वेदज़ हैं, जो गंदगी से, पसीने से पैदा होते हैं। यह चारों खानियां 84 लाख योनियों में विभाजित हैं। हिंदू मैथोलॉजी बोलती है। कुछ जल के बनते हैं, कुछ थल के बनते हैं, कुछ नभ के बनते हैं, कुछ धरती के नीचे रहने वाले जीव। कुछ दो पांव वाले हैं, कुछ चार पांव वाले हैं, कुछ रेंग-रेंग के चलने वाले हैं। इस परमपिता परमात्मा ने सबको पालने का ज़िम्मा ले रखा है। रिज़्क, रोज़ी प्रदान करना इसकी ज़िम्मेदारी है, अखाद्य है, अभेद्य है, अच्छेद्य है, अतुल्य है, अतुल्य है, समर्थ है, सुयोग्य है, सर्वाधार है, सर्वनायक है, सर्वश्रेष्ठ है, संपूर्ण है। This is almighty god is complete in all respect. परिपूर्ण है और पूर्ण का किया हुआ सब पूरा होता है। यह हर कमी, खामी, दुर्बलता से मुक्त है, निराकार।
इस धरती पर 2100 से ज़्यादा मज़हब हैं, मिशन हैं, विचारधाराएं हैं। सब इस परमपिता परमात्मा को अपनी भाषाओं में, अपनी लैंग्वेज़ेस में, इसके नाम को उच्चारित करते हैं। कुछ हमारे संज्ञान में हैं, हमारी नॉलेज में हैं, कुछ हमारी नॉलेज में भी नहीं हैं। कहने का भाव यह है, सारा जहान, सारी सृष्टि, खंड, ब्रह्माण्ड, लोक परलोक इस परमपिता परमात्मा की स्तुति करने में लगे हुए हैं, इसकी भक्ति करने में लगे, इसकी इबादत करने में लगे। भगत कौन होते हैं जो इस परमपिता परमात्मा से प्यार करते हैं, प्रेम करते हैं, प्रीत करते हैं, लव करते हैं। और सूफ़ी संतों ने एक शब्द निकाला, इश्क़ हक़ीक़ी। इसको हक़ीक़त भी बोला गया है। इस हक़ीक़त से जो प्यार करते हैं। यही परमपिता परमात्मा ही है। जब यहां कुछ भी नहीं था, यह तब भी था, अब भी है, आगे भी रहेगा निराकार। यह परमपिता परमात्मा ही है, जो सर्वेसर्वा है, सर्वाधिकारी है, सर्वगुण संपन्न है, सुयोग्य है, सर्व श्रेष्ठ है, अति उत्तम है निराकार।
सत्संग कार्यक्रम के अवसर पर विशाल संख्या में साध संगत के साथ मौजूद वैदिक कॉलोनी एवं पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत हाउसिंग बोर्ड - वैदिक कॉलोनी के पदाधिकारियों ने महात्मा जी का स्वागत किया।








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