कटनी ( मुरली पृथ्यानी ) कहीं गलत हो रहा हो और कोई शिकायत न करे तो इसका मतलब यह नही होता कि सबकुछ अच्छा ही चल रहा है। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि आम जरूरतों की पूर्ति हेतु आम जन इतना दबा हुआ लगता है कि व्यवस्था सुधार में आगे आने के लिए उसमें कोई रुचि ही नही बची।
क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि जिन जिम्मेदारों के हाथ में शक्तियां होती हैं वह हर उस गलत को सही करेंगे जिससे आम नागरिकों और समाज पर गलत असर पड़ता है। पर मुश्किल इस बात की है कि आम आदमी का तमाम व्यवस्थाओं पर भरोसा कितना खरा होता है यह तय हो ही नही पाता। कहतें है सिर्फ बातों से कोई काम नही होता काम करने के लिए काम करना पड़ता है, जहां भी जो गलत है उसे सिर्फ गलत कहने भर से काम नही होता है। गलत क्यों हो रहा है इसकी पहचान कर उसे सही करने से फर्क पड़ेगा ये तो सब मानते ही होंगे। देखा जाता है जहां भी गलत करने वालों को किसी की कृपा से ढील मिलती है फिर वो किसी की परवाह ही नही करतें क्योंकि वो जानते हैं उनके गलत पर किसी का संरक्षण है। बस यहीं सुधार की आवश्यकता होती है और जो जिम्मेदार होतें हैं वो चाहे तो हर गलत को सही में बदल सकतें है कोशिश करना ही बड़ा कदम होता है। बस कोई कदम तो व्यवस्था सुधार में उठाये फिर आम नागरिकों का भी विश्वास मजबूत ही होता है।

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