गुरु अपने शरीर से नहीं जोड़ता - ब्रह्म ज्योति देह के बीच बोले, ब्रह्म दर्शन ही प्रभु के दर्शन हैं, ब्रह्म दर्शन ही सतगुरु के दर्शन हैं, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में पटियाला पंजाब से पधारे केंद्रीय ज्ञान प्रचारक महात्मा विजय धीर जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी ( मुरली पृथ्यानी ) करने वाला ये आप होता है समझ लो इस बात को। हे निरंकारी मिशन वालों, समझ लो इस बात को। ये करने वाला स्वयं आप है। मैं नहीं हूं। यही है। जब मुझे ये समझ में आ गई बात, तो कर्ता का भाव मुझे छू नहीं पाएगा। कर्ता के भाव का आ जाना कि मैं कर रहा हूं, अज्ञानता की निशानी है। जो समझे महा मूर्ख, अज्ञानी है। इसको लगता है कि ये शरीर है, अज्ञानी है। मैं यहां बैठ के बोलता हूं, मैं नहीं बोल रहा। ये स्वयं मेरे से बुलवा रहा है। किसी को पता होता है। मैं कहां हूं बीच में? मैं तो है ही नहीं कहीं। मैं तो साधु हूं। थोड़ी देर पहले तबला बज रहा था। ढोल बज रहे थे। हारमोनियम बज रहा था। अब वही पड़े हैं, क्यों नहीं बोल रहे ये? अरे बजाने वाला उतर गया। धरे के धरे रह गए। मुझे कौन बजा रहा है? यही ब्रह्म है। मुझसे कौन बुलवा रहा है? यही ब्रह्म है। तो फिर मैं कहां हूं? यही तो ज्ञान है। गुरु, जब ये आ जाता है, तो अहम टूट जाता है। गुरु का ज्ञान सबसे पहले मेरे अहंकार पर चोट करता है। क्योंकि अहंकार ही है जो मेरे और गुरु के दरमियान बाधा बने हुए हैं। पहले प्रण में ही गुरु ने बोल दिया। अवतार, जब पांच प्रण ना मानिए। तन मन धन मेरा मानोगे शहंशाह ने कहा, तो मेरा ब्रह्म ज्ञान आपके पास रहेगा। अगर तन मन तुम अपना मान लोगे, तो मेरा ज्ञान वापस आ जाएगा। जब तुम अपना नहीं मानोगे, तो अहंकार से बच जाओगे। जब अहंकार नहीं रहेगा, तो गुरु से प्यार हो जाएगा। यही बात यहां कह रहे हैं। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग कार्यक्रम में पटियाला पंजाब से पधारे केंद्रीय ज्ञान प्रचारक महात्मा विजय धीर जी ने अवतार वाणी के शब्द पर विचार व्यक्त किए।
संसार में अक्सर एक बात कही जाती है कि दीये के नीचे अंधेरा होता है, ये सच भी है। जहां पर दीया रखा होता है, उसके नीचे अंधेरा होता है। वो दाएं-बाएं रोशनी देता है, लेकिन उसके अपने नीचे अंधेरा होता है। तो ब्रह्मज्ञानी महात्माओं को पूछा गया, क्या आपके दरवाज़े पे भी ये ऐसा ही है? जो बोलने वाले होते हैं, स्वयं उनके जीवन में ऐसा नहीं होता। तो महात्मा जवाब देते हैं, कि अगर अकेला दीया है, तो ये बात माननी चाहिए, और सच भी है, कि उसके नीचे अंधेरा हो सकता है। अगर उसको बहुत से जलते हुए दीपकों के बीच में रख दिया जाए, तो किसी के भी नीचे अंधेरा नहीं रहता। जो दाएं वाला दीया है, उसकी रोशनी, बाएं वाले दीये के अंधेरे को ढक कर रही है। जो बाएं वाला दीया है, उसकी रोशनी, दाहिने वाले दीये के अंधेरे को उठा रही है। यही तो फार्मूला सच्चे पातशाह ने यहां दिया।
ब्रह्मज्ञानी संतों में बैठोगे, तो कोई कारण नहीं बनता कि जिंदगी में कभी भ्रम आ जाए। कोई कारण नहीं बनता कि विश्वास में कमी आ जाए। क्योंकि संत जो होते हैं, ये गुरु के दूत होते हैं। संत जो होते हैं, ये दयालु, कृपाधर होते हैं, जब सहज में बोलते हैं, तो निरंकार उसे पूरा करता है। गुरु ने हमें ब्रह्म से जोड़ा है, हम तस्वीरों से जुड़े हुए व्यक्ति नहीं हैं, हम ज्ञान से जुड़े हुए हैं। गुरु की नुमांदगी स्टेज पे होती है। हम किसी तस्वीर के पुजारी नहीं हैं, हम तो ब्रह्म के पुजारी हैं। हम तो ब्रह्म का दर्शन करते हैं। ब्रह्म दर्शन ही प्रभु के दर्शन हैं। ब्रह्म दर्शन ही सतगुरु के दर्शन हैं।
बाबा जी ने कहा है, भूलिए मत, ये शरीर ब्रह्म नहीं है। ये तो आने जाने वाला है। गुरु का भी, मेरा भी, सबका, ये शरीर ब्रह्म नहीं है। तो फिर ब्रह्म क्या है, जिसकी बात कर रहे हो? तो कहते हैं, ब्रह्म जो कि, जिससे, बीच, बोले, जो इसमें बैठ के काम कर रहा है, क्या लेना है, इस मिट्टी के खिलौने से? ये तो जाने आने वाला है। ब्रह्म तो, वो है, जो इसमें कार्यग्रस्त है। गुरु अपने शरीर से नहीं जोड़ता। समय की बात है। कोई बहन, हज़ूर बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के पास आई। आकर के कहती है, कि बाबा जी, मुझे आँखों की बीमारी है। मैं डॉक्टर के पास गई थी। डॉक्टर ने ये बूँदें लिखी हैं, डालने के लिए। तो ध्यान आया, आपसे आशीर्वाद लेती चलूं। आप कृपया, ये दो बूँदें, दवाई मेरी आँख में डाल दें। हज़ूर थोड़ा बिजी थे, सहज में कहते हैं, वो सामने महात्मा खड़े हैं। जाइए, उनके पास, दवाई डलवा लीजिए। यही शरीर, ब्रह्म नहीं है। दवाई डलवा लीजिए। तो वो माता, आगे से कहती है, नहीं, नहीं बाबा जी। मैंने तो आपसे, ध्यान बनाया हुआ है। आप डाल दो। आप आशीर्वाद दो। बाबा जी ने कहा, कोई बात नहीं। बाबा जी ने पकड़ा दवाई, दो बूँद दवाई डाली। अब वो बहन, आगे से हाथ जोड़ कर पूछती है, हज़ूर, अब मैं ठीक हो जाऊँगी ना? तो बाबा जी धीरे से कहते हैं, इसके बारे में मुझे पता नहीं है। अरे बाबा जी। आप स्वयं परमात्मा हो। अगर आपको नहीं पता, तो किसको पता है? बाबा जी आगे से क्या कहते हैं इसीलिए तो मैंने बोला था, कि सामने वाले से दवाई डलवा लीजिए। क्योंकि आपका आराम, उसके हाथ से लिखा हुआ था। अब आपने मेरे को दवाई डालने के लिए बोला। दवाई मैंने डाल दी। आराम आए, चाहे ना आए। ये मैं नहीं कह सकता।
जब ब्रह्म बोलता है, तो भ्रम टूटते हैं। कोई भी संत, भ्रम में नहीं रहना चाहिए। हम कहते हैं, रहमत। संगत में अक्सर बोलते हैं। किसी महापुरुष से मिलते हैं, महाराज, रहमत करो। कोई आगे कहता है, क्या हाल है? तो आगे से कहते हैं, रहमत है जी। ये रहमत क्या होती है? जो रहने वाली बात है, उसे रहमत कहते हैं। जो, सदैव रहेगी। हज़ूर ने बोला, किस्मत किसे कहते हैं? किस्मत, किसकी मत है, तेरे पास? अगर तेरे पास गुरु की मत है तो तेरी किस्मत कभी बेका़र हो नहीं सकती। अगर तेरे पास किसी और की मत है, तो मैं कह नहीं सकता तेरी किस्मत कैसी है। तो फिर किस्मत बनाने के लिए किसकी मदद चाहिए? गुरु की मदद।
हम तो शरीर पर भूले हुए लोग हैं लेकिन सतगुरु फिर बताता है। उठो इससे ऊपर। आप ज्योत के साथ जुड़िए। ब्रह्म ज्योति देह के बीच बोले। जो बैठ के कार्य ग्रस्त है। अब उससे बात करो। यही शिक्षा दीक्षा सतगुरु हर समय अपने भक्तों को देते हैं। बाबा हरदेव सिंह महाराज, गुरु शरीर नहीं होता है। गुरु फोटो भी नहीं होता है। गुरु तो स्वयं निरंकार होता है। आप नारायण कलां का विराजमान रहता है। किसी ने देखना है तो देख सकता है। कभी भी। विराजमान रहता है। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओँ ने गीत विचारों के माध्यम से भी अपने भाव प्रकट किए।

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