सतगुरु देह का नाम नहीं है, सतगुरु होता ज्ञान है, सतगुरु को देह समझना भूल है अज्ञान है, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में महात्मा शंकर भाषानी जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी ) हरदेव वाणी के शब्द से भी सतगुरु के दर्शन का जो महत्व है, वो बताया जा रहा है क्योंकि अध्यात्म में सतगुरु के दर्शन का बहुत बड़ा महत्व माना गया है बोला भी गया है कि गुरु बिन गत नहीं और शाह बिन पत नहीं। एक सतगुरु ही होता है जो हमें मानव जीवन के मूल उद्देश्य अर्थात आत्मा को परमात्मा से मिलाने का कार्य करता है और किसी के अंदर ये क्षमता नहीं होती है। हर एक वस्तु का, हर एक चीज का, हर एक विषय का कोई ना कोई प्रतीक हुआ करता है। जिस प्रकार से हम रोड पर जा रहे हैं और लाल बत्ती जलती है। इसका मतलब रुकने का संदेश है, हरी बत्ती जलती है, चलने का संदेश है। एरो बना होता है, उस तरफ मुड़ने का संकेत है, इसी प्रकार सतगुरु भी जो हुआ करता है, वो इस साकार ब्रह्म का प्रतीक होता है, ऐसा सब गुण साकार का प्रतीक होता है। निराकार है साकार तू जग के पालनहार। जो सतगुरु होता है, इस साकार का स्वरूप हुआ करता है। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में हरदेववाणी के शब्द पर महात्मा शंकर भाषानी जी ने उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए। उन्होंने कहा जल में कुंभ है, कुंभ में जल ...