भक्ति का दान मिल जाए, तो सहजता जीवन में आती है, किसी के कर्मों से किसी का दिल ना दुखे, ये सबसे बड़ी भक्ति है, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में प्रचारक काजल साधवानी जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) संगत मां, एक ऐसा आईना, जहां एक तरफ जीवन जीने की प्रेरणा, वहीं व्यवहार, और गुरु के दर पर कैसे प्रीत निभानी है, यह सिखलाई बार-बार हम श्रवण कर रहे हैं। संपूर्ण हरदेव वाणी में बाबा जी ने यह इस रूप में कहा कि धन्य है वह सिख जिस पर सतगुरु को विश्वास है। हम वो खुश किस्मत गुरसिख हैं जिन्हें सतगुरु ने विश्वास करके संगत मां की गोद में बैठाया है। यह समझाया है कि निखारते चले जाए नित्य प्रतिदिन अपने जीवन को, आज गुरु दर पर हाजरी उन्हीं की लगी है, जिन पर गुरु की निगाह पड़ गई। गुरु का विश्वास जीवन में तभी आता है, जब गुरु सिख गुरु की बात मान ले, उसके वचनों को मान देने लगे, उसकी सिखलाइयों को ढालने लगे जीवन में। गुरु को विश्वास था माता शबरी पर तभी तो ज्ञान की बख्शीश देकर इंतजार की रहमत करवाई कि एक दिन जरूर आएंगे तुझे मुक्त करने के लिए। विश्वास था तभी तो मीराबाई के सामने उसके गुरु ने भेद को खोल दिया कि तू चाहे वन में रहे चाहे राज भवन में रहे, इस मान की कृपा तेरे सर से कभी नहीं जाती। उन्हें जहर के प्याले भी दिए गए, लेकिन फिर भी बाल बांका नहीं हुआ, क्योंकि गुरु की रहमत साथ थी। उन्होंने माना और पा लिया। आज यह अवस्था हमारी बन जाए कि हम भी गुरु की बात को माने। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग कार्यक्रम में हरदेव वाणी के शब्द पर प्रचारक काजल साधवानी जी ने व्यक्त किए।
गुरु सिख किसको कहते हैं ? सिर्फ वह नहीं जो यहां आकर अपनी हाजरी लगाएं। गुरु सिख वह नहीं जो वाणियों को नित्य प्रतिदिन दोहराएं। गुरु सिख वह है जो जीवन के एक-एक पल में सीखता चला जाए। गुरु के दर पर वही पहुंचता है जिसको गुरु पर विश्वास होता है। किसी के कहने पर हम कितने ही दिन जाएंगे, कितने ही घंटे हम बिताएंगे, लेकिन नित्य प्रतिदिन हाजरी वही गुरु के दर पे लगाता है जिसको गुरु पर अडोल विश्वास हो। विश्वासी भक्त हो उसे कोई भी डोलायमान न कर सके। क्योंकि परिस्थितियां हैं जीवन की बड़ी उथल-पुथल करने वाली। भक्त भगवान की मूरत को साकार में देखता है और साकार की सिखलाइयों को मानने लगता है।
सुख सारे संसार के भक्ति के पीछे आते हैं। हमारे महापुरुष जी ये बात हमें हमेशा सिखाते हैं कि एक भक्ति का दान मांगने वाले को फिर जीवन में कुछ मांगना नहीं पड़ता, क्योंकि भक्ति अपने आप में परिपूर्ण है और भक्त जब उनकी बात को मानता है, तो भगवान खुश हो कर उसको भक्ति का ही तो वरदान देते हैं। उसके जीवन को सुख, समृद्धि तो खुद ही मिल जाती है, लेकिन अगर भक्ति का दान मिल जाए, तो सहजता जीवन में आती है, सरलता जीवन में आती है, और यही तो मानव जीवन का उद्देश्य भी है। हमारी यात्राएं गुरु द्वारों पर, तीर्थस्थानों पर क्यों हैं ? सिर्फ इसलिए ही तो हैं कि हमें सुकून साधनों में तो नहीं मिलता। हमें सुख उन दुनियावी चीजों में नहीं मिलता, सुकून गुरु के दर पर मिलता है।
गुरु का घर जिस जगह हम इस वक्त में बैठे हैं। हमें किसी कर्म बंधन से नहीं जोड़ा गया, हमें सरल और सहज भक्ति सिखाई गई और एक बड़ी सुंदर बात है कि जो समझाई भी जाती है कि किसी के वचनों से, किसी के कर्मों से किसी का दिल ना दुखे। ये सबसे बड़ी भक्ति है, और जितना-जितना चेतन होकर भक्त इस तरीके का जीवन जीता चला जाता है उतना-उतना वो खुद भी सुखी होता है और औरों के लिए भी वो सुख का कारण बनता है। इस बात के लिए जरूरी है गुरु के किए को मानना, उसकी बात को स्वीकार करना।
शुक्राना करें निरंकार का कि हमारी इंद्रियां सलामत हैं, हमारे जीवन सजे हुए हैं, खुशियां मालिक ने बक्शी हैं, तो पल-पल उसका शुक्राना करें क्योंकि नवाजने वाला, बक्शीश करने वाला ही खुद मालिक है और इसी मालिक ने सिखाया है कि शुक्र करें सर्वदा, खुशहाली या तंगी है। घड़ी सुहानी बीत रही आएगी सो चंगी है। गुरु के आगे झुकने वाला मूल्यवान हो जाता है। मुख उजला हो जाता उसका, दुनिया में यश पाता है। जिसने गुरु के दिल में जगह बनाई। उसको कला भी गुरु ने सिखा दी कि कैसे नींवा होकर वो राह में चलें। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने गीत विचारों के माध्यम से भी अपने भाव प्रकट किए।

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