समर्पण दिवस - जीवन में सुकून इसलिए नहीं कि आप भी हो, सुकून सिर्फ इसलिए कि आप ही हो, तेरे रहमो करम के किस्से अनेक हैं मेरे रहबर, लफ्ज़ पड़ जाते हैं कम बयां करते-करते, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रीवा से पधारीं प्रचारक महात्मा खुशबू ठारवानी जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) अगर पूरे संसार की धरती को कागज बना दिया जाए, वनस्पति को कलम बना दिया जाए और ब्रह्मांड में जितना भी पानी है, उससे स्याही बना दी जाए, तो भी सतगुरु की रहमतों को बयान नहीं किया जा सकता। सतगुरु की निगाह जिस पर पड़ी, वह हीरा बन जाता है, वह पत्थर ही देवता बन जाता है। हम भी पत्थरों में पड़े थे, एक मेहरबान, एक मसीहा आया, जिसने पूजा के काबिल बनाया। सतगुरु की निगाह जिस पर पड़ी, वह जर्रा भी खिल गया। सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के इतने रहम-ओ-करम हैं जिन्होंने जीवन पर्यन्त शिक्षाएं भी दीं और साथ में भक्ति मार्ग में किस प्रकार हमें टिके रहना है, वह भी समझाया और पूरे ही श्लोक में हमने सुना भी कि भक्ति और समर्पण, ये दो शब्द बहुत इस्तेमाल किए गए हैं, लेकिन सबसे पहले बात ये आती है कि हमें समझना होगा कि समर्पण है क्या ? अक्सर हम कह भी देते हैं कि हमें समर्पण करना है, मुझे समर्पण करना है लेकिन समर्पण की परिभाषा ही यह है कि मुझे कुछ करना ही ना पड़े, वह एफ़र्टलेस हो। उक्त विचार 13 मई समर्पण दिवस के अवसर पर संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रीवा से पधारीं प्रचारक महात्मा खुशबू ठारवानी जी ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा एक शिष्य ने गुरु से पूछा कि आखिर समर्पण है क्या ? तो गुरु ने कहा, कि क्या आपको यह लगता है कि गुरु के चरणों में, अपने इष्ट के चरणों में नतमस्तक हो जाना, उसके चरणों में पुष्प चढ़ा देना समर्पण है ? या आपको यह लगता है कि गुरु की हर शिक्षाओं को मानना समर्पण है ? तो शिष्य ने सोचा कि गुरु की शिक्षाओं को मानने के बाद भी क्या कोई समर्पण है ? तो गुरु ने समझाया कि हां, जब गुरु की शिक्षाओं को नि:संदेह, उसमें कोई शक और शंका ना रखके, कि उनके मुखारबिंद से वह वचन निकले और दूसरी ही नजर में वह गुरु सिख के जीवन में उतर जाए, तब वह असल मायने में समर्पण होता है। अनंत, अनंत शिक्षाएं हैं सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज की कि यह समय भी कम पड़ जाएगा। लेकिन कुछ अंश जो आदरणीय राजमामी जी के मुखारबिंद से सुनने को मिले कि बाबा जी अक्सर यह जोर दिया करते थे कि भक्ति हुकुम में की जाए। जो हुकुम आए, जो आदेश आए, उसके अंदर अगर भक्ति की जाती है, तो वह परवान होती है।
एक बार नमस्कार की लाइनें चल रही थीं, तो एक महापुरुष ने उनके भाव थे कि बाबा जी के चरणों में नमस्कार की जाए, और आदेश ये आ रहा था कि आप लाइनों में ही दूर से नमस्कार करें, लेकिन उन महापुरुष के भाव, वो लाइन तोड़ के बाबा जी के पास आए, नमस्कार ही की और कहा कि, "बाबा जी, आप ऐसी रहमत करो, आप ऐसी कृपा करो कि हम आपके आदेशों की पालना कर पाएं।" तो बाबा जी ने कहा कि "आदेश हुकूम तो ये था कि आप लाइन में रह के नमस्कार कारी करें। आप आगे आए, आपसे विनती भी की गई कि लाइन में रह के नमस्कार करें।" फिर अंदर कोठी में जाके भी बाबा जी ने यही समझाया कि "जो खड़े हो कर लाइनों में नमस्कार कर रहे थे, उनके तो कार्य सफल होने ही हैं। लेकिन जो उस आदेश का उल्लंघन करके आगे आते हैं, उनके लिए कुछ कहा नहीं जा सकता।" हुकुम में भक्ति करना सिखाइए कि हुकुम की भक्ति ही फरवान की जाती है।
अब सब हम ये देखते हैं कि इंसान की ये फितरत है कि आज इंसान अपने दुखों से इतना दुखी नहीं होता जितना दूसरे के सुख देख के दुखी होता है। इसी पर एक बार जब बाबा जी कहीं टूर पे गए, तो एक भगत ने पूछा कि "बाबा जी मुझे तो दो साल हो गए हैं ज्ञान लिए लेकिन मेरी कोई अवस्था और व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आया अब तक।" अवस्था, व्यवस्था माना वो अपनी फाइनेंसियल कंडीशन को भी रेफर कर रहे थे। तो बाकी सबको तो मैं देखता हूं कि इतने कम समय में उनकी व्यवस्था भी उनकी मनो की अवस्था भी इतनी तब्दीली आ गई है, लेकिन मेरे में कोई चेंज नहीं आया। फिर बहुत ही सहज भाव में बाबा जी ने समझाया कि "एक बांस की टोकरी लेकर आओ और उसमें पानी भर कर आओ। क्या उसमें पानी टिकेगा ?" तो ज़ाहिर सी बात है कि नहीं, बांस की टोकरी में पानी नहीं टिकेगा। लेकिन वापस से उस बांस की टोकरी लेकर जाओ, उसमें फिर से पानी भर कर लाओ। तब थोड़ा पानी कम ठहरेगा। और ये क्रिया अगर बार-बार की जाएगी तो बांस के जो छेद हैं, बांस की लकड़ी फूल जाएगी और पानी उसमें ठहर जाएगा। ये बांस की टोकरी भी कहीं ना कहीं वो हमारा मन ही है जहां माया के इतने छेद हो चुके हैं, इतने वहम भ्रम इतने तब्दील हो चुके हैं कि जब इस बांस की टोकरी को इस मन को बार-बार सत्संग में लाया जाता है और वो ज्ञान का पानी उसमें बार-बार पड़ता है, तो उसमें ज्ञान ठहरता है। उसमें वो गुरु के वचन तब्दील होते हैं, तब वो बांस भी फूल जाता है। वो मन भी गुरु वचनों से फूलता है, वो अवस्था और व्यवस्था में तब्दीली आना शुरू हो जाती है।
अक्सर बाबा हरदेव सिंह जी महाराज एक बात और कहते थे कि हर चलना पहुंचना नहीं होता। तो हमें तो ये भक्ति का मार्ग ही दिया गया है, इस पर महापुरुषों द्वारा चलाया भी जा रहा है, हम चल भी रहे हैं। लेकिन कैसे पता चले कि हम जो चल रहे हैं, वो हमारा पहुंचना है ? तो इसके लिए समझाया गया कि वो तो हम सतगुरु के चरणों में अरदास कर रहे हैं कि चलना भी आपने सिखाया है तो पहुंचाना भी आपने है, ये तो हमारे सतगुरु के चरणों में अरदास हो गई। लेकिन इसके बाद हमारी रिस्पॉंसिबिलिटीज़ क्या हैं ? हमारे क्या कर्तव्य हैं जो हम इस मार्ग पर चलें। वो है जो हमें कहा जाता है करने के लिए, वो हम करें और जो नहीं कहा जाता संगत में वो ना करें। कहा क्या जाता है कि सेवा, सत्संग, सिमरन। सिमरन जितना करते हैं, मन उतना प्रबल होता है। सेवा हो तो निष्काम भाव की हो और संगत को जीवन में जितनी ज्यादा प्रायोरिटी देते हैं, उतना फायदा हमें ही होता है। आज हम संगत नहीं आए तो सतगुरु का क्या फायदा या क्या नुकसान ? लेकिन फिर भी ये आवाज बार-बार दी जाती है क्योंकि ये मानवता के मसीहा हैं और ये चाहते हैं कि पूरी मानव जाति सुखी हो।
गुरु की शिक्षाएं हैं तो सुकून है। जीवन में सुकून इसलिए नहीं कि आप भी हो। जीवन में सुकून सिर्फ इसलिए है कि आप ही हो। ये भाव जब भक्ति में आते हैं, तो ही भक्ति समर्पण की ओर चलती हैं। भक्ति में व्यापार नहीं। यह दिल का सौदा है। इसमें कर्म को विशेषता दी गई है। बाबा जी का भी वह कोट हमने सुना है कि लॉग इज द टंग एंड शॉर्ट इज द हैंड। कि जुबान तो बहुत बड़ी है। बहुत बड़े-बड़े बोल बोले भी जाते हैं, शिक्षाएं दोहराई भी जाती हैं, लेकिन कर्म बहुत छोटे हैं। कर्मों में वह तब्दीली ही नहीं कि कान बंद पड़े हैं, लेकिन आज भी जुबान वो उस रूप में चालू है। कहने का भाव कि जितना हम सुनते नहीं है, उससे ज्यादा बोल देते हैं, लेकिन जुबान का इस्तेमाल सिर्फ इस गुरु की स्तुति के लिए हो, सिर्फ दूसरों के जख्मों को भरने के लिए हो। वह बात भी हमने सुनी कि गुरसिख तो गिरे हुए को उठाता ही है, लेकिन गुरु मत तो गिरने ही नहीं देती।
सदगुरु के चरणों में यही अरदास, यही प्रार्थना कि मेरा हर वक्त गुजरे तेरा ज़िक्र करते-करते, यह ज़ुबा ना थके तेरा ज़िक्र करते-करते। मैं अक्सर कर जाती हूं गलतियां, आप झुकते नहीं उन्हें माफ़ करते-करते। तेरे रहमो करम के किस्से अनेक हैं मेरे रहबर, लफ्ज़ पड़ जाते हैं कम बयां करते-करते। कट जाए यूं ही जिंदगी का यह सफर आपके साथ रहते-रहते, आपका दीदार करते-करते। आपके साथ रहते-रहते, आपका दीदार करते-करते। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने गीत विचारों के माध्यम से भी अपने भाव प्रकट किए व कार्यक्रम पश्चात लंगर प्रसाद की भी साध संगत के लिए व्यवस्था की गई।


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