कटनी (प्रबल सृष्टि) जिले के गांव - गांव, गली - गली विद्यमान प्राचीन इतिहास की कला से परिपूर्ण सांस्कृतिक विरासत खुद को निहारने के लिए मुझे पुकारती रहती हैं। मूक पत्थरों का अनबोला दर्द मुझे भी पीड़ित करता रहता है । जब कभी उनसे मिलने पहुंचता हूं तो मानों उनमें कुछ सांस लौट आती है । और विलंब हो तो वे मायूस हो जाते हैं । गत रविवार को बिलहरी में तपसी मठ की विरासत से मुलाकात कर आगे बढ़ा तो इसके बगल में पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित छतरियां मानो इशारे से बुलाते हुए कहने लगीं यार हमसे भी तो मिलते जाओ।
गाड़ी खड़ी कर छतरियों वाले परिसर में प्रवेश किया तो तीन से चार फीट के अनजाने पौधों में खिले पीले रंग के सुंदर फूलों की छटा देख मन आनंद विभोर हो गया । मानो, उपेक्षित पड़ी छतरियों का दिल बहलाने के लिए प्रकृति ने स्वयं परिसर को सजाने का प्रयास किया हो । सहयात्री श्री रामलला सिंह यादव से पूछने पर उन्होंने ये फूल बड़े चकौडा के होना बताया । किंतु इसके साथ ही लोगों द्वारा परिसर में की गई शौच क्रिया की बदबू का भभका भी मानो फन उठाकर अपनी उपस्थिति का आभाष देने लगा।
इतिहास के किसी राजघराने के महापुरुषों की स्मृति में बनी और पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित छतरियों के आसपास आज लोगों का शौच किया जाना अपनी विरासत पर शौच किया जाने का साक्षात प्रमाण था । ऐसे में भला कौन पर्यटक यहां आना चाहेगा । जबकि यह स्थल तत्कालीन पुष्पावती ( वर्तमान बिलहरी ) के सम्राट युवराजदेव की धर्मपत्नी रानी नोहला द्वारा निर्मित कराए गए ऐतिहासिक शिव मंदिर से जुड़ा क्षेत्र ही है।
इसी तरह बहोरीबंद के ग्राम सिंदूरसी की पहाड़ियों की चट्टानों में गुप्त कालीन ( 3 री - 4 थी सदी में ) शेष शैय्या में लेटे भगवान विष्णु, महिषासुर मार्दिनी एवं दो अन्य प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं । किंतु वहां जाने वाले मार्ग में भी स्थानीय जन शौच क्रिया करते हैं । इस दशा को देख सहज ही कहा जा सकता है कि जब अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को समाज और प्रशासन उचित महत्व नहीं देता तब कुछ लोग इसी तरह अपनी विरासत पर हगते और मूतते हैं। जबकि दोनों स्थल पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं ।
लेखक - इतिहासकार राजेन्द्र सिंह ठाकुर




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