जिन घरों में बहनों, बेटियों और माताओं का सत्कार होता है, वहाँ साक्षात लक्ष्मी का वास होता है, जहाँ संतों की कृपा दृष्टि होती है, वहाँ निरंकार स्वयं रक्षा करता है, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में महात्मा नोतनदास केवलानी जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) वाणी के अंदर सतगुरु ने फरमाया है कि निरंकार प्रभु आप ही सबका पर्दा रखता है। कठिन समय, दुःख और मुसीबत के समय वह हमेशा हाथ देकर हमारी रक्षा करता है। ऐसा सुंदर संदेश हमें दिया गया है। हम सभी को अपने मन में झांक कर देखना चाहिए कि क्या हम वाकई 'निज' (सच्चे रूप में गुरु के) बन पाए हैं ? निज वही होता है जो सारी साध संगत से निश्छल प्यार करता है, सबका सत्कार करता है और सबका सम्मान करता है। वह कभी किसी संत के ऊपर क्रोध या गुस्सा नहीं करता। अगर कोई संत कुछ कह भी दे, तो वह सहन कर लेता है और प्रेम का व्यवहार बनाए रखता है। सब में निरंकार रूप विराजमान है। शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी महाराज हमेशा कहा करते थे कि इस निरंकार को हमेशा अपने बीच में रखो और इसका एहसास हर पल अपने मन में बसा कर रखो। बाबा हरदेव सिंह जी महाराज हमेशा समझाते थे कि कोई भी बात करो, तो हमेशा सोच-समझ कर किया करो; ऐसा करने से कभी कोई गलती नहीं होगी। इंसान जब इस निरंकार प्रभु को भुला देता है, तब उसके मन में जो भी सांसारिक आवाजें या भाव आते हैं, वह उन्हें वैसे ही प्रकट कर देता है। अगर हम ऐसा करते हैं, तो हम गुरु के 'निज' कैसे हुए ? अगर हमें यह समझ में आ जाए कि सब में उस परमपिता परमात्मा का ही अंश है और सभी संत हैं, तो हमारा व्यवहार सबके प्रति विनम्र हो जाएगा और हमसे कोई भूल नहीं होगी। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में अवतार वाणी के शब्द पर महात्मा नोतनदास केवलानी जी ने उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
उन्होंने कहा जब हम निरंकार प्रभु को विसार देते हैं, तभी हमसे गलतियाँ होती हैं और मनमानी शुरू हो जाती है। इसलिए यही प्रार्थना है कि निज बनने का निरंतर प्रयास करें। दास ने बाबा अवतार सिंह जी महाराज के विचारों में पढ़ा था कि जब हम संगत के संतों के साथ गलत व्यवहार करते हैं—जैसे दुश्मनी, वैर, विरोध, नफरत या ईर्ष्या रखते हैं—तो हमारे जीवन से सुख और आनंद रूपी गाड़ी रुक जाती है। फिर वह आगे नहीं बढ़ सकती। ऐसे में कोई चाहे कि उसे सुख या आनंद मिल जाए, तो वह सर्वथा असंभव है।
शादियों में जब आनंद कारज के समय लावां पढ़ी जाती हैं, तो पति-पत्नी दोनों को गृहस्थ जीवन में एक समान अधिकार दिए जाते हैं। जिन घरों में बहनों, बेटियों और माताओं का सत्कार होता है, वहाँ साक्षात लक्ष्मी का वास होता है। उन्हें गृहलक्ष्मी का रूप माना गया है। एक बार एक संत ने अपनी पत्नी से बहुत कड़े शब्दों में बात की और उन्हें डांटा। जब वह संत दिल्ली में सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के पास नमस्कार करने गए, तो बाबाजी ने उनसे अपना मुंह फेर लिया। उस संत को यह बात बहुत अखरी कि सतगुरु ने उनसे मुंह क्यों फेर लिया ? उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। वह तुरंत घर लौटे, अपनी पत्नी से अपनी भूल के लिए माफ़ी मांगी और कहा, "मुझसे क्रोध में बड़ी गलती हो गई, मुझे क्षमा कर दो।" जब वह संत दोबारा सतगुरु की हज़ूरी में गए, तो बाबाजी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "क्या तुमने माफ़ी मांग ली ?" सोचिए, हमारे भाईयों को अपने परिवार में, अपने घर में कैसा पावन व्यवहार रखना चाहिए। ज्ञान लेने का असली अर्थ यही है कि हम अपनों का और संतों का आदर करना सीखें।
यह निरंकार परमपिता परमात्मा सर्वशक्तिमान और अत्यंत दयालु है। वह निराकार रूप में सर्वत्र विद्यमान है। बड़े भाग्यशालियों को ही इस परम ज्ञान की प्राप्ति होती है। संसार में जितने भी मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे बनाए जाते हैं, जहाँ प्रभु राम या श्री कृष्ण के जयकारे लगाए जाते हैं, उन सभी शास्त्रों का यही निचोड़ है कि जिस कर्म में सतगुरु शामिल होते हैं, वही आत्मा का उद्धार कर पाता है। बाबाजी ने तब समझाया था कि जहाँ संतों की कृपा दृष्टि होती है, वहाँ निरंकार स्वयं रक्षा करता है और बड़ी से बड़ी मुसीबत टल जाती है। यदि कोई बच्चा ऊँचाई से गिर रहा हो और आपकी नज़र पड़ जाए, तो तुरंत पूरे विश्वास से कहो—“तू ही निरंकार, तू ही निरंकार, तू ही निरंकार परमपिता परमात्मा, रक्षा करो।” वह बच्चा सुरक्षित बच जाएगा।
बाबा हरदेव सिंह जी महाराज हमेशा फरमाते थे कि जीवन में झुकना कभी कमजोरी नहीं होता, बल्कि यह आत्मिक शक्ति का सूचक है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी से एक बार उनके कार्यालय में किसी पुराने सेवक से बात करते समय कुछ कड़े शब्द निकल गए। बाद में जब उन्हें अपनी भूल का बोध हुआ, तो उन्होंने पदानुक्रम को भूलकर उस सेवक से क्षमा मांगी। जब देश का सर्वोच्च नागरिक इतनी विनम्रता दिखा सकता है, तो हमें भी अपने जीवन में अभिमान को त्याग कर क्षमा और विनम्रता को अपनाना चाहिए। क्षमा मांगने से इंसान छोटा नहीं होता, बल्कि उसकी महानता और उसका यश और बढ़ जाता है।
साध संगत जी, सतगुरु देव हमेशा हमें सुखी देखना चाहते हैं। ज्ञान को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने व्यावहारिक जीवन में (अमल में) लेकर आएं। संतों को अपने गृह स्थान पर आमंत्रित कर उनका सत्कार करें, निस्वार्थ भाव से सेवा और सुमिरन करें। जब भी निरंकार से कुछ मांगना हो, तो बिना किसी परदे या डर के, हाथ जोड़कर अपनी बात रखें। सत्संग नियमित रूप से आएं। जब हम गुरु के वचनों को पूर्णतः मान लेते हैं, तो हर मनोकामना निश्चित ही पूरी होती है। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने भी गीत विचारों के माध्यम से अपने भाव प्रकट किए। इस अवसर पर सेवादल संचालक श्री शंकर भाषानी ने समस्त साध संगत को जानकारी दी कि आगामी रविवार 26 जुलाई को सुबह 10.30 बजे से दोपहर 1 बजे तक जिला स्तरीय विशाल महिला संत समागम का आयोजन भवन में किया जाएगा जिसका आध्यात्मिक लाभ समस्त साध संगत अवश्य प्राप्त करे।

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