सतगुरु सारे के सारे गुण गुरसिख में समाहित कर देता है .. पारस लोहा कंचन करें गुरु करे आप समान ..गुरसिख अपना अस्तित्व मिटा देता है .. संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में हरदेव वाणी के शब्द पर महात्मा विजय रोहरा जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी ( मुरली पृथ्यानी ) किसी महात्मा का संग कराकर किसी महात्मा की याद कराकर डोर खींच लेते हो अपने कदमों में, ये और कुछ नहीं तेरी रहमत के सदके ही ये संगत मिल रही है, तेरी रहमत के सदके ही ये सेवाएं मिल रही है, ब्रह्म ज्ञानी संतों की सभा में बैठकर कि इन सूफी संतों के चरणों में बैठे हैं। सूफी संत उसे ही कहते हैं जिसका नाता इस निरंकार प्रभु, अल्लाह, वाहे गुरु, परमात्मा से रिश्ता होता है। आप सब सूफी संत हैं और एक-एक सूफी संत की जब निगाह पड़ती है सहज में ही आशीर्वाद मिल जाते हैं। सच्चे पातशाह ने जब यह ज्ञान दे लिया अमोलक दात हमारी झोली में डाली तो हमारा नाता इस प्रभु परमात्मा से जुड़ा है। जिन्होंने इस प्रभु को जान लिया है इससे इकमिक हो गए हैं सब के भले की कामना अपने जीवन में रखता है, सतगुरु सारे के सारे गुण गुरसिख में समाहित कर देता है, पारस लोहा कंचन करें गुरु करे आप समान यह गुरु की दयालता होती है। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में हरदेव वाणी के शब्द पर विचार करते हुए महात्मा विजय रोहरा जी ने उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
उन्होंने कहा गुरसिख का मन निर्मल हो जाता है सबके भले की कामना हृदय में होती है अहंकार इसके जीवन में आता नहीं है क्योंकि ज्ञान ऐसा मिला है इस ज्ञान को जीवन में धारण करके चलेंगे तो परेशानी नही आती। परेशान तो तब होते हैं जब गुरु की शिक्षाओं से दूर चले जाते हैं । गुरु के एक एक वचन को मान लेते हैं तो साध संगत जी ऐसी कोई ताकत नहीं है कि मेरा रास्ता रोक ले क्योंकि विशाल परम सत्ता के साथ जुड़े होते हैं। लाख भुलेखे जीवन में आएंगे कदम कदम पर आएंगे पल पल आएंगे लेकिन गुरसिख अपने गुरू के चरणों का अकीदा विश्वास मजबूत रखता है कि गुरू ने जिस ताकत के साथ मुझे जोड़ा है इससे बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं है।
गुरू की रहमतों को गुरसिख ने पल पल महसूस किया है क्योंकि मन की तारें इस निरंकार से जुड़ी रहती है इसलिए संत ब्रह्मज्ञानी बार बार चेतन करते हैं। जिनकी मन की तारें अंतिम सांसों तक इस निरंकार प्रभु से जुड़ी रहती है वो कह लेंगे कि जिधर मैं देखता हूँ उधर तू ही तू है हर शै में जलवा तेरा हूबहू है। गुरसिख दुख-सुख से ऊपर की अवस्था है जब सच्चे पातशाह ने पांच प्रण दिये थे कि ये पांच प्रण है, इन पांच प्रणों पर जीवन को अर्पित समर्पित करना पड़ेगा। गुरु ने हमारे ऊपर विश्वास किया है, हमारे ऊपर विश्वास करके ये तीन लोक का स्वामी हमारी झोली में डाल दिया जो सारी कायनात को चला रहा है।
उन्होंने कहा कि रुठना, मनाना, गुस्सा होना ये गुरसिख नही करते यह सिर्फ मिश्री जैसे बन जाते हैं। जैसे मिश्री जल में अपने अस्तित्व को मिटा देती है, उसी प्रकार से गुरसिख अपना अस्तित्व मिटा देता है। यह जिव्हा को अपने गुण गाने की शक्ति देता है, हाथ को अपनी महिमा लिखने की शक्ति देता है। अपने हृदय में अच्छे भाव रखना और मन में निरंकार प्रभु का एहसास केवल गुरु की कृपा है। विश्वास मजबूत रखें डुलायमान नहीं हो, निरंकार तो न्यायकारी है लेकिन बक्शनहार सतगुरु होता है। इससे बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं है इसके अलावा कहीं भी दिल लगाओगे कहीं भी मन लगाओगे ठोकरे ही ठोकरे हैं। जो भक्ति करने से रोके उनका त्याग ज़रूरी है उनसे रखनी दूरी है। गिरधर की प्रेमा भक्ति में मीरा बाई चूर हुई नहीं सुहाई भक्ति जिनको उन सबसे वो दूर हुई।
हम अरदास प्रार्थना करते भी हैं तो शुक्र के साथ करें जो हमारे हित में होगा वह सच्चे पातशाह पूरी कर देता है। इससे पहले अनेक वक्ताओं ने गीत और शब्द रूप में अपने भाव प्रकट किए इस अवसर पर बड़ी संख्या में साध संगत की उपस्थिति रही।

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