इस निराकार के उस रूप को जानना होता है जो शास्त्रों में वर्णित है, उसे अग्नि जला नहीं सकती, वायु उड़ा नहीं सकती, शस्त्र काट नहीं सकता, उसका ओर न छोर है, यह चारों ओर है, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में महात्मा सुनील मेघानी जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) इन साँसों का सही मोल, इंसान तभी डाल पाता है, जब इस परम पिता परमात्मा, निराकार, जो अंग संग है, कण कण में व्याप्त है, शास्त्रों में भी जिसकी परिभाषा, सर्व व्यापक, सर्वभौमिक और सर्वज्ञ लिखी हुई है, उसे सद्गुरु की कृपा से जान पाता है। आज इंसान अपने जीवन में बहुत सूना सूना सा महसूस कर रहा है। जबकि हर सुख सुविधा, इंसान के हिस्से में है। हर प्रकार से, उसके जीवन में, वह सुख और खुशियाँ, जो सांसारिक रूप की हैं, वह इंसान के पास है, फिर भी वह सूना सूना, अपने जीवन को महसूस कर रहा है उसका मूल कारण क्या है? मूल कारण, ये परम पिता परमात्मा, जिसको उसे जानना है। इस परमात्मा के साथ, उसको अपने इस अस्तित्व की मुलाकात करवानी है उससे वो अनभिज्ञ है। आज इंसान, बाहरी आडंबर, बाहरी कर्मकांड को भक्ति मानकर संसार में चल रहा होता है। शारीरिक व्यवस्था को एक स्थिर रूप में संसार में अगर कोई, ऐसा कार्य कर रहा, उसे भक्ति मानकर चल रहा होता है लेकिन असल में तो भक्ति इस परम पिता परमात्मा को प्राप्त करने के बाद ही इंसान के जीवन में आती है। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में पवित्र हरदेव वाणी के शब्द पर महात्मा सुनील मेघानी जी ने उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
उन्होंने कहा, भक्त हमेशा ही संसार में इस आत्मिक तल के रूप में जीवन को व्यतीत करता हुआ चलता है। भक्त की यही स्थिति, संसार में रहती है। एक ऐसे रूप को, अपने जीवन में विचरण करते हुए चला जाता है, जिस रूप के लिए मानव तन, धारण किया है। इस मानव तन का असल रूप, असल मकसद जो है, इस परम पिता परमात्मा की प्राप्ति करना है। अब प्रश्न ये उठता है, कि ये प्राप्ति हो कैसे? क्योंकि संसार में जिस तरह हम देख रहे होते हैं कि कांच और हीरा, दिखने में तो दोनों ही एक हैं। दोनों में कोई अंतर नहीं है। लेकिन असल में, उस हीरे की पहचान, सिर्फ और सिर्फ सत्संग में आकर, इंसान को हो पाती है। असल में, इस ज्ञान को पाने के बाद ही भक्ति चालू होती है। ब्रह्मज्ञानी संतों के संग में ये उसे पता चलता है।
जैसे गाय, भिन्न-भिन्न प्रकार की, भिन्न-भिन्न रंगों की होती है। वह चितकबरी होती है, भूरी होती है, काली होती है, लाल कलर की भी होती है और अनेक रंगों की होती है। लेकिन अगर उसके दूध की ओर निगाह जाए, तो हमेशा ही उसका दूध सफेद निकलता है। जिस तरह, पेड़ों के बारे में ज़िक्र आता है, कि भिन्न-भिन्न प्रकार के पेड़ रहते हैं लेकिन सब पेड़ों की लकड़ी में आग छुपी रहती है। उसी तरह कोई पगड़ी पहनकर, कोई टोपी लगाकर, कोई वस्त्रों को इस तरह से, अपने शरीर में धारण करके कोई किसी वर्ण से जुड़ा हुआ, कोई किसी आश्रम से जुड़ा हुआ, ये भिन्न-भिन्न प्रकार के संसार में जीव तो दिखाई देते हैं। लेकिन उनकी आत्मा एक है। ये परम पिता परमात्मा जिसकी पहचान करना, इस जीवन का एक अमूल्य कार्य है, जो इंसान को ज़रूर, इस जीवन में करना होता है। इस निराकार को पहचानना होता है। इस निराकार के उस रूप को जानना होता है जो शास्त्रों में वर्णित है कि उसे अग्नि जला नहीं सकती, वायु उड़ा नहीं सकती, शस्त्र काट नहीं सकता। उसका ओर न छोर है, यह चारों ओर है। इंसान गहराई से पढ़ तो लेता है। लेकिन जब तक गुरु जीवन में नहीं आता। तब तक ये निरंकार उसके जीवन में नहीं आ सकता क्योंकि गुरु ही सर्वोपरि है।
महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य से सवाल किया गया कि गुरु की परिभाषा क्या है? गुरु और सतगुरु में अंतर क्या है? तब गुरु द्रोणाचार्य जी, स्पष्ट कर रहे हैं कि गुरु संसारिक रूप में केवल मार्ग बताता है। लेकिन सतगुरु स्वयं मार्ग होता है। तो ऐसे मार्ग के साथ हम सब रुंहें, जिन्होंने भी ब्रह्म ज्ञान को सतगुरु की शरण में आकर धारण किया है। उस मार्ग पर हम चल रहे होते हैं। यह मार्ग सतगुरु ही हुआ करता है, जो सत्य का मार्ग है।
यह शुकराने का भाव, केवल ब्रह्म ज्ञान लेने के बाद इंसान के जीवन में आता है। शुकराना करता हुआ, जीवन को जी रहा होता है, क्योंकि शुकराना ही इंसान को एक ऐसी आनंद की अवस्था जीवन में लाता है। बाकी शिकायतें, अगर इंसान करता रहता है, तो जो उसके पास परम पिता परमात्मा की कृपा से, जो उसके पास है, उसका भी वह सुख नहीं भोग सकता। लेकिन जब शुकराना करता है, तो वही सुख, वही साधन, इंसान को सुख देने लगते हैं। वही धन जो उसके पास है, वह सुख देने लगता है। तो यही भाव, यही भावना इंसान की परिवर्तित हो जाती है और जब परिवर्तित हो जाती है, तो इंसान के मन का रूपांतरण हो जाता है। कहते हैं कि ज्ञान के बाद, इंसान का कुछ नहीं बदलता। उसका खाना-पीना और जिस रूप में वह, जिस वर्ण-जाति में रहता है, गुरु कुछ नहीं बदलता। सिर्फ बदलता है तो मन। मन का रूपांतरण, इंसान का हो जाता है। और मन जब बदल गया, मन जब पावन हो गया, तो फिर इंसान का असली आनंद, यहीं मन से होता है। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने भी गीत विचारों के माध्यम से अपने भाव प्रकट किए।

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