नफरत हमेशा दीवाल का ही काम करती है तो प्यार हमेशा सेतु का काम करता है, पानी के जैसा ही शीतल अपने आपको बनाना है, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में महात्मा राजकुमार हेमनानी जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी ( मुरली पृथ्यानी ) नफरत देती दुख ही दुख तो प्यार ने सुख पहुंचाया है, नफरत धूप है और हमें शीतल जल के हिसाब से रहना है, प्यार से रहना है। पानी को भी हम अगर ठंडे रूप में पीते हैं तो ठंडक आती है। हमें नफरत से हमेशा सचेत रहना है और पानी के संग जैसा ही शीतल अपने आपको बनाना है। सतगुरु जी यही हमें याद दिला रहे है कि नफरत हमेशा उजाड़ती है और प्यार में हमेशा बसाव रहता है। जब प्यार रहता है तो सब के चेहरों में खुशी रहती है और सब के भाव भी एकदम प्रसन्न रहते हैं। हम कहीं भी किसी से प्यार से बात करते हैं तो वह भी प्यार से बात करता है और नफरत से बात करते हैं तो वह भी हमें नफरत के भाव में बात करता है। हम ऐसा भाव रखें प्यार वाला ताकि संसार की नज़र भी आपके ऊपर बनी रहती है कि ये कौन है, जो प्यार से बात करते हैं, प्यार का भाव रखते हैं। जिन्होंने ज्ञान नहीं लिया है, जो मिशन से नहीं जुड़े हैं वह भी हमारे सत्संग में शामिल होने के लिए, खुशी खुशी मन से आना चाहते हैं। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में हरदेव वाणी के शब्द पर महात्मा राजकुमार हेमनानी जी ने साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
उन्होंने कहा नफरत हमेशा दीवाल का ही काम करती है तो प्यार हमेशा सेतु का काम करता है, सेतु मतलब इस पार से उस पार जाने के लिए हमें सेतु बनाना पड़ता है जो एक दूसरे से मिलाने का काम करता है। जो हमें आदेश आता है, उस आदेश की पालना करते चलेंगे, तो हमें खुशियां ही खुशियां प्राप्त होंगी, समय रहते आप ऐसी खुशियां प्राप्त करेंगे जो कभी जीवन में आपने सोचा नहीं होगा। जब आप सेतु का भाव बनाएंगे, प्यार का भाव बनाएंगे एक दूसरे से मिलने का भाव बनाएंगे, एक दूसरे के चरणों में नमस्कार करेंगे, एक दूसरे का सत्कार करेंगे, तभी हम वो सेतु का भाव बना सकते हैं प्यार जगा सकते हैं। जीवन में प्यार करेंगे तो हमें जिस भी संत का आशीर्वाद मिलेगा वह दवा के रूप में कार्य करता है।
हमें हमेशा इस बात पर जोर देना है कि नफरत का भाव कभी मन में नहीं रखना। नफरत से बड़े-बड़े राजा महाराजा उजड़ जाते हैं बड़े-बड़े परिवार उजड़ जाते हैं। प्यार की कमी रहती है तो सब कुछ होते हुए भी कुछ नही रहता, कभी किसी के मुंह से ऐसी बात निकल जाती है तो हमें हमेशा क्षमाभाव बनाए रखना है ताकि वह भी खुशी खुशी अपना जीवन बिताएं और हम भी अपना खुशी खुशी जीवन बिताएं। संतो का आशीर्वाद लें सतगुरु माता का आशीर्वाद लें।
अभी सभी ने समागम के बारे में चर्चा की, संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ होई। समागम में हम सब लोग एकत्रित होते हैं अनेकों अनेक भाषाओं में अपना भाव रखते हैं पर सबके भाव एक ही होते हैं, जैसे कहते हैं किसी के खान पान पर हमें कोई ध्यान नहीं देना है। जिसको जो पसंद हो वही उसका खान पान है। संत समागम हरि कथा इसमें सभी एकत्रित होकर निरंकार सतगुरु का यशोगान करते हैं। सुमिरन में ध्यान मगन रहते हैं सरोवर में जाते हैं जिसका नाम संतोख सरोवर है जिन्हें सतगुरु ने आशीर्वाद दिया हुआ था कि जाओ भाई संतोख सिंह जी आप यह बगीचा संभालो। बगीचा ऐसा था जंगल, जंगल भी महाजंगल, जिसमें जानवर भी रहते थे। सत्य वचन करके उन्होंने उस जंगल को संभाला और उसे बहुत ही सुंदर रूप दिया जो संतोख सरोवर कहलाता है। भाव यही है कि सतगुरु के वचनों को सत्य वचन करके मानना है। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने विचार - गीत के माध्यम से अपने भाव रखे इस अवसर पर बड़ी संख्या में साध संगत की उपस्थिति रही।

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