( मुरली पृथ्यानी) कटनी शहर या उपनगरीय क्षेत्र में कहीं भी चले जाइये यातायात व्यवस्था सिर्फ भगवान भरोसे ही चल रही मिलेगी बाकी मजे में सिर्फ लापरवाह और गैरजिम्मेदार लोग ही हैं इन्हें न कोई देखने वाला है न बोलने वाला। कहीं रोड में पार्किंग है कहीं दुकानों के बाहर से सड़क तक दस दस फिट पसरा अतिक्रमण हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। फजीहत तो बस आम नागरिकों की है जो सड़क होने के बावजूद रुक रुक कर इधर उधर से निकलते हैं। यह रोज की ही बात है एक दो दिन की नहीं है। ट्रैफिक सेंस की जागरूकता जिन्हें हैं उन्हीं की बदौलत कुछ सही यातायात संभव हो पाता है बाकी तो सब भगवान भरोसे ही है। ऑटो वालों का हाल तो यह है कि कोई कहीं से आवाज भर दे तो फट से ऑटो खड़ी हो जाएगी चाहे पीछे चलने वाले चाहे ठुक ही जाएं। समझदारी से गाड़ी सही जगह खड़ी करना एक कला ही है जो कम लोग ही कर पाते हैं। वैसे यातायात विभाग को सड़क पर दिखना होना चाहिए पर कहीं कोई नही होगा तो फिर जिसकी जैसी मर्जी कोई नही बोलने वाला। आखिर जागरूकता भी कोई चीज होती है पर इतने सालों से इसपर बात कितनी हुई है यह भी तो विचारणीय है। वर्तमान में चहुंओर व्याप्त स्थिति देख तो आम नागरिक भी कहने लगे हैं कि इसमें सुधार होगा भी या स्थिति और खराब होती ही जाएगी। हालांकि सुधार तो खुद जनता ही कर सकती है अगर सभी चाहे तो। वैसे भी जिस जिले के बड़े अधिकारी अपने चैम्बरों से नही निकलते तो सड़के फिर सिकुड़ ही जाती हैं और इसके कारण जगजाहिर ही होते हैं। अब मुख्य सवाल पर बात करते हैं कि अब किया क्या जाए ? सुगम और सुरक्षित यातायात रोज के जीवन का हिस्सा होना चाहिए यह तो जनता और प्रशासन चाहते ही हैं फिर क्यों नही यह संभव हो पाता ? सभी सुगम सुरक्षित यातायात के प्रति सजग रहें इसके लिए प्रयास सिर्फ औपचारिक न होकर आदत बने। सभी इसमे अपना अमूल्य योगदान देने लगें तो फिर तस्वीर कटनी की वो बन सकती है जो दूसरे शहरों के लिए उदहारण का काम करें बस इस सोच को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
( मुरली पृथ्यानी) कटनी शहर या उपनगरीय क्षेत्र में कहीं भी चले जाइये यातायात व्यवस्था सिर्फ भगवान भरोसे ही चल रही मिलेगी बाकी मजे में सिर्फ लापरवाह और गैरजिम्मेदार लोग ही हैं इन्हें न कोई देखने वाला है न बोलने वाला। कहीं रोड में पार्किंग है कहीं दुकानों के बाहर से सड़क तक दस दस फिट पसरा अतिक्रमण हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। फजीहत तो बस आम नागरिकों की है जो सड़क होने के बावजूद रुक रुक कर इधर उधर से निकलते हैं। यह रोज की ही बात है एक दो दिन की नहीं है। ट्रैफिक सेंस की जागरूकता जिन्हें हैं उन्हीं की बदौलत कुछ सही यातायात संभव हो पाता है बाकी तो सब भगवान भरोसे ही है। ऑटो वालों का हाल तो यह है कि कोई कहीं से आवाज भर दे तो फट से ऑटो खड़ी हो जाएगी चाहे पीछे चलने वाले चाहे ठुक ही जाएं। समझदारी से गाड़ी सही जगह खड़ी करना एक कला ही है जो कम लोग ही कर पाते हैं। वैसे यातायात विभाग को सड़क पर दिखना होना चाहिए पर कहीं कोई नही होगा तो फिर जिसकी जैसी मर्जी कोई नही बोलने वाला। आखिर जागरूकता भी कोई चीज होती है पर इतने सालों से इसपर बात कितनी हुई है यह भी तो विचारणीय है। वर्तमान में चहुंओर व्याप्त स्थिति देख तो आम नागरिक भी कहने लगे हैं कि इसमें सुधार होगा भी या स्थिति और खराब होती ही जाएगी। हालांकि सुधार तो खुद जनता ही कर सकती है अगर सभी चाहे तो। वैसे भी जिस जिले के बड़े अधिकारी अपने चैम्बरों से नही निकलते तो सड़के फिर सिकुड़ ही जाती हैं और इसके कारण जगजाहिर ही होते हैं। अब मुख्य सवाल पर बात करते हैं कि अब किया क्या जाए ? सुगम और सुरक्षित यातायात रोज के जीवन का हिस्सा होना चाहिए यह तो जनता और प्रशासन चाहते ही हैं फिर क्यों नही यह संभव हो पाता ? सभी सुगम सुरक्षित यातायात के प्रति सजग रहें इसके लिए प्रयास सिर्फ औपचारिक न होकर आदत बने। सभी इसमे अपना अमूल्य योगदान देने लगें तो फिर तस्वीर कटनी की वो बन सकती है जो दूसरे शहरों के लिए उदहारण का काम करें बस इस सोच को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
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