जनवरी माह की संत निरंकारी पत्रिका में भक्ति पर बल दिया गया है, सकारात्मक भाव युक्त भक्ति, आनंदमय है भक्ति, भक्ति में गुरु महिमा, भक्ति में समर्पण भाव, प्रेमाभक्ति की अवस्था, नवधा भक्ति, प्रभु को पाना भक्ति है, दिव्य जीवन प्रेमाभक्ति से सहित सभी लेख आदि पठनीय है
कटनी ( मुरली पृथ्यानी ) जनवरी माह की संत निरंकारी पत्रिका के संपादकीय में भक्ति पर बल दिया गया है, यहां संपादक हरजीत निषाद कहते हैं प्रभु को पाना भक्ति है, भक्तों के लिए यह पंक्ति भक्ति का उत्तम सूत्र है। जो प्रभु को गुरु कृपा से पा गया वह धन्य हो गया। वह भक्ति की बूंद नहीं भक्ति का महासागर पाकर गोते लगाने लगा। जो तुम हो वही मैं हूं, जैसे शब्द फिर शास्त्र-वाक्य नहीं रह जाते बल्कि जीवन में समाहित होकर जीवन को ही बदल देते हैं। भक्ति मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बाहर नहीं भीतर ही है, काम, क्रोध, मद-लोभ, मोह अहंकार का पूरा साम्राज्य अन्तर्मन के साथ छल करता है। गुरु ही इनसे छुड़ाता है इसीलिए भक्तों ने गुरु को गोविन्द से बड़ा कहा। संपादक हरजीत जी लिखते हैं संसार में तरह-तरह से भक्ति की जाती है। प्रभु को सर्वत्र मानकर प्रभु की आराधना की जाती है पर गुरु से मिलने वाली दिव्य दृष्टि के बिना, चर्म चक्षु जो दिखाते है उतना ही देखा-सुना-समझा जाता है। आन्तरिक आंखे खुलें तो ब्रह्म का विराट स्वरूप नज़र आए वरना युद्ध भूमि में खड़े अर्जुन की तरह केवल युद्ध स्थल, सेनाएं, कौन अपना, कौन पराया आदि ही दिखेगा। जीवन...