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हिंदी के महान संपादक राजेंद्र माथुर की पुण्यतिथि पर उनको नमन, प्रस्तुत है करीब चवालीस साल पहले अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित उनके लेख का हिंदी अनुवाद

( प्रबल सृष्टि ) हिंदी के महान संपादक राजेंद्र माथुर की पुण्यतिथि पर उनको नमन । प्रस्तुत है करीब चवालीस साल पहले अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित उनके लेख का हिंदी अनुवाद।


हिन्दी की दैनिक पत्रकारिता - देर आयद - 1

( हिंदी की दैनिक पत्रकारिता पर अँगरेज़ी दैनिक टाइम्स ऑफ़ इंडिया में राजेंद्र माथुर ने दो आलेख लिखे थे।इनमें हिंदी भाषी प्रदेशों की पत्रकारिता के विकास और उसके अवरोधों के बारे में शानदार विश्लेषण किया गया था। यह अदभुत और बेजोड़ विश्लेषण था।यह भी ध्यान में रखना होगा कि राजेंद्र माथुर मूलतःअँगरेज़ी के प्राध्यापक थे।वे चाहते तो इस परदेसी भाषा में पत्रकारिता करके दुनिया भर के पाठकों को चमत्कृत कर सकते थे। उनकी अँगरेज़ी भाषा हिंदी से कहीं कमतर नहीं थी।लेकिन अपने भारत प्रेम और सरोकारों के चलते उन्होंने स्वयं को संप्रेषित करने के लिए राष्ट्रभाषा हिंदी का चुनाव किया।प्रस्तुत है मूल अँगरेज़ी में लिखे गए उन लेखों का हिंदी अनुवाद।निश्चित रूप से अनुवाद में उनकी शैली से विचलन हुआ होगा।  क्योंकि, राजेंद्र माथुर के हिंदी लेखन से अनुवाद की तुलना नहीं हो सकती। ) 

अगर किसी भाषा में पत्रकारिता को उसकी गुणवत्ता और प्रसार से जाना जाता है, तो कहना होगा कि हिन्दी का आगमन देर से हुआ। वास्तव में हिन्दी के दैनिक अख़बारों ने 1975  के बाद ही अपना रंग ज़माना शुरू किया, जब देश में आपातकाल लगा। 

दिल्ली के इकलौते हिन्दी अख़बार को छोड़कर दिल्ली से बाहर ऐसा कोई हिन्दी दैनिक नहीं था, जो एक लाख की प्रसार संख्या का दावा कर सके। यह अजीब इसलिए भी है ,क्योंकि 25 करोड़ से ज्यादा लोग हिन्दी बोलते हैं और अन्य करोड़ों लोग हिन्दी बखूबी समझते हैं।लेकिन ,1975 के बाद हिंदी की दैनिक पत्रकारिता में अचानक उभार आया।आंचलिक अख़बारों  की संख्या बढ़ने लगी। दक्षिण भारत की भाषाओं के अखबारों के साथ जो दो दशक पहले हुआ, वह हिन्दी अखबारों के साथ आज हो रहा है। मगर पूरी ईमानदारी से कहा जाए तो हिन्दी में कोई ऐसा राष्ट्रीय समाचारपत्र अभी तक नहीं है, जिसका पूरे देश में सम्मानजनक प्रसार हो और जो पूरे देश में जनमत को प्रभावित कर सकता हो। ऐसे समाचारपत्र की वाकई कमी है, जिससे हिन्दी भाषी क्षेत्रों की श्रेष्ठतम प्रतिभाएँ जुड़ी हों।  

ऐसा क्यों होना चाहिए ? 

इसके अनेक कारण हैं और इनका सम्बन्ध सिर्फ दैनिक अख़बारों से नहीं है। हिन्दी भाषी क्षेत्र इतना बड़ा और फैला हुआ है कि इसमें फ़ोकस की कमी है। ऐसा कोई शहर नहीं है, जिसकी मान्यता हर जगह सांस्कृतिक राजधानी के रूप में हो। ऐसा कोई उप - क्षेत्र भी नहीं है, जिसे यह कहा जा सके कि यहाँ से सांस्कृतिक गतिविधियाँ निर्धारित होती हैं। कभी ऐसा भी समय था , जब एक मराठी संत आध्यात्मिक घोषणा करने के लिए बनारस जाया करता था।आज कौन सा शहर है जो हिन्दी पट्टी का बौद्धिक मक्का हो । 

ब्रिटिश राज आने से उत्तर प्रदेश और बिहार सामंती पिछड़ेपन का शिकार हो गए। नए  ज्ञान और नए कारोबार  की रोशनी पहले पेरिफेरल प्रेसीडेंसी में पहुँची । पहला हिन्दी अखबार 1826 में पूरब के कलकत्ता से निकला और एक सदी तक यह हिन्दी भारत की पत्रकारीय राजधानी बना रहा। सूयकांत त्रिपाठी निराला, इला चंद्र जोशी, भगवती चरण वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी और एच. एस. वात्स्यायन अज्ञेय जैसे दिग्गज लेखकों ने कलकत्ता से अनेक  पत्रिकाओं का सम्पादन किया।महान लेखक रामानंद चटर्जी ने 1928 में प्रसिद्ध हिन्दी मासिक पत्रिका विशाल भारत का प्रकाशन अँगरेज़ी  पत्रिका मॉडर्न रिव्यु और बंगाली पत्रिका प्रवासी को टक्कर देने के लिए शुरू किया था। कलकत्ता ने हिन्दी लेखकों और उद्यमियों को इसलिए आकर्षित किया, क्योंकि यह 1911 तक भारत की राजधानी था। वहाँ बड़ी संख्या में हिन्दी भाषी व्यापारी थे और आज भी हैं। इसके अंदरूनी इलाकों में ज़मींदारी क्षेत्र थे , जहाँ हिन्दी बोली जाती थी। यहाँ बंगाली अभिजात्य वर्ग भी था, जिन्हें देश का बौद्धिक नेता कहकर हीन दृष्टि से देखा जाता था। उत्तर प्रदेश और बिहार कलकत्ता के केचमेंट एरिया थे और अवसरों की तलाश में लेखक महानगरों का रुख करते थे। दिल्ली में सिर्फ विदेशी अफसर रहते थे और इसके पास केवल अतीत का गौरव था। लिहाजा अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं थी। उत्तर प्रदेश के शहरों में भी अवसर सीमित थे। वे सिर्फ आसपास के ग्रामीण इलाक़ों के हिस्से थे। लेकिन कलकत्ते के सामने हिन्दी को आगे बढ़ाने से अधिक और भी ज़रूरी काम थे। इसलिए हिन्दी की हैसियत दोयम ही रही और पत्रकारिता अतिथि - क्षेत्र में फल फूल नहीं सकी। 

राजधानी दिल्ली चले जाने के बाद हिन्दी की आँख पूरब से पश्चिम की ओर मुड़ गई , लेकिन दिल्ली और हिन्दी के बीच कोई कार्बनिक रिश्ता नहीं था। इसका सम्बन्ध उर्दू अदब और पुरानी मुग़ल राजधानी से था। ऐसे कोई महानगर नहीं थे, जिन्हें हिन्दी अपना कह सकती। गांधी जी के दौर में और इससे  पहले भी प्रमुख लेखक लखनऊ, इलाहाबाद या बनारस में हुआ करते थे, लेकिन वे मासिक पत्रिकाओं के लिए लिखते थे।ये पत्रिकाएँ कला के संरक्षकों द्वारा सफेद मसनद के सहारे लेट कर आराम से पढ़ी जाती थीं। उनके लिए ये पत्रिकाएँ पढ़ना हुक्का पीने जैसा लोकाचार था।उनको ऐसा लगता था कि इन पत्रिकाओं को पढ़ने से वे ज़्यादा ख़ूबसूरत नज़र आते हैं।इस लोकाचार के चलते क़ायदे का ऐसा दैनिक हिन्दी अख़बार निकालना कठिन था, जिसे लोग पढ़ें। इस वजह से दशकों तक हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं की भाषा बनी रही। इसके बाद इसका विकास हुआ और यह लोकप्रिय और  राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिकाओं की भाषा बन गई। यह दैनिक अख़बार की भाषा आज तक नहीं बन सकी है। 

असल में हिन्दी को एक बड़ी कठिनाई हुई , जिसे पर्याप्त रूप से समझा नहीं गया।कठिनाई यह थी कि  हिन्दी एक नई भाषा है, जिसका विकास बमुश्किल 150 साल पहले हुआ। यह भारत की बड़ी भाषाओं में सबसे नई  है। इस दौर में भी अधिकतर समय वह अपनी शब्दावली, वाक्य विन्यास और मुहावरों के विकास में लगी रही। उसे दो कठिन विकल्पों में से एक को चुनना था कि  बृज या अवधी बोलियों की तरफ झुके अथवा खड़ी बोली की तरफ ? यदि यह किसी बोली को चुने तो कौन सी बोली को ? यदि खड़ी बोली को चुने तो तो इसे अपनी शब्दावली संस्कृत से लेना चाहिए या उर्दू से ? क्योंकि फ़ारसी अदालतों में और विशेषज्ञ भाषा मानी जाती थी। उर्दू या शुद्ध संस्कृत की तरफ कोई बहुत खिंचाव नहीं था। जो 1982 में प्रचलित भाषा बन गई, उसे बेकार और दुरूह भाषा माना जा रहा था । आम तौर पर कम पढ़े लिखे लोग न तो बहुत संस्कृतनिष्ठ भाषा समझते थे और न बहुत उर्दूनिष्ठ भाषा। वे दर्ज़नों  स्थानीय बोलियाँ बोलते थे , जो उनके सीमित उद्देश्यों के लिए पर्याप्त थीं। किसी भी लेखक को बहुत समय तक यह पता नहीं चला कि उसे कैसा लिखना चाहिए। इस भ्रम के बीच अँगरेज़ी शिक्षा और बंगाली पुनर्जागरण का काल आ गया और हिन्दी को उनके मानकों से जूझना पड़ा, जो बहुत ऊँचे थे। इस नई हिन्दी भाषा से उनकी बराबरी करने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती थी। पत्रकारिता तभी मुमकिन है , जब उसके पास सम्प्रेषण का उपयुक्त साँचा हो। हिन्दी के पास देश को आज़ादी मिलने तक भी ऐसा कोई साँचा नहीं था। लिहाजा यह समझना आसान है कि हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत मासिक पत्रिकाओं से क्यों हुई। मासिक पत्रिका के सम्पादक को तो विचार तथा काम करने के लिए ज्यादा वक्त मिल जाता है। उसे अपने विचारों को ठोस रूप देकर किस प्रकार अभिव्यक्त किया जाए , यह भी समझने के लिए काफी समय मिल जाता है। इसके विपरीत, दैनिक अख़बार निकालने के लिए वक़्त कम मिलता है। कई बार तो इसके चलते जो कहा गया, वह नींद में बड़बड़ाने जैसा लगता है। 

विषय - वस्तु की बात करें तो साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी की प्रतिभाओं के लिए ज्यादा अनुकूल थी, क्योंकि कुछ लोगों के लिए वह बुद्धिमत्तापूर्ण तरीक़े से तरतीब के साथ कम शब्दों में संगत बात को रखे जाने की मेहनत से बचने का रास्ता होता है।साहित्य में कोई लेखक किसी वास्तविकता को असंगत बातों की श्रृंखला, अनिरंतरित वैचारिक आवेग के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, जो वास्तव में एक कवि का वास्तविकता को देखने का एक अंदाज़ होता है।पत्रकार का रास्ता अलग होता है। वह चीजों को ठीक से आपस में जोड़े बिना एक क़दम भी नहीं उठा सकता। वह कोई बात असंगत रूप से पेश नहीं कर सकता। उसे तरतीब के साथ तथ्यों को रखना होता है। हिन्दी वालों में  इस हुनर को सीखने की प्रक्रिया धीमी रही। जब वह साहित्य की तरकीबें  पत्रकारिता में उपयोग करने की कोशिश करता है, तो वह बहुत औसत दर्जे का अख़बार निकाल पाता है। हिन्दी में विविध भाषागत विकल्प खुले होने के कारण अजीब स्थिति पैदा हो गई। लिखित हिन्दी का प्रारंभ  किसी मुहावरे से होता था , जो बोलचाल की हिन्दी में प्रयुक्त मुहावरों से बहुत अलग होता था।इसकी वजह यह थी कि हिन्दी अनेक स्वरूपों में बोली जाती थी।इसे मानकीकृत हिन्दी-कृत्रिम भाषा होना ही था।इसके अलावा दो मामलों में इस पर आरोप लगे।एक तरफ तो इसे कठिन और किताबी भाषा कहा गया। दूसरी तरफ इससे इतनी सरल होने की अपेक्षा की गई , जिसमें कठिन विषयों, विचारों और सूक्ष्म अनुभवों को बहुत स्पष्टता के साथ व्यक्त किया जा सके। आलोचक दोनों बातें एक साथ चाहते थे। वे उस हिन्दी से आगे नहीं जाते थे , जो उन्होंने सब्ज़ी मंडी  में या घरेलू नौकरों से सुनी है। उन्हें यह भी अपेक्षा थी कि हिन्दी में बर्नार्ड शॉ और शेक्सपियर जैसा साहित्य लिखा जाए। वे चाहते थे कि ऐसा बहुत सीमित शब्दावली के भीतर हो जाए। 

लिखित और बोलचाल की भाषा में जो अंतर था, वह भले ही अपरिहार्य हो, लेकिन इसने औसत दर्जे के लोगों को भी एक बौद्धिक रूप में पेश होने का खूब मौका दिया। वे खुद को बड़ा और गहरा भाषाविद  दिखाने के लिए बहुत पंडिताऊ और क्लिष्ट हिन्दी लिख रहे थे और जता रहे थे कि देखो हम कितनी सूक्ष्म बात को हिन्दी में व्यक्त कर सकते हैं। इस तरह वे बहुत सृजनशील लेखक के रूप में पहचाने जाने की आकांक्षा रखते थे।मसलन, सृजनशील उपन्यासकार यह उम्मीद करता था कि वह एक ऎसी मानक भाषा में अपनी रचना लिखे, जिसमें  सूक्ष्म बातों को भी व्यक्त किया जा सके।दूसरी तरफ वह आम आदमी की बोली के भी निकट रहना चाहता था। लेकिन जिनके पास कहने को कुछ भी नहीं था, उन्होंने भी शब्दजाल बुनकर लेखक बनने की कोशिश की। वे जो शब्द लिखते थे, उन्हें कम लोग ही बोलते या समझते थे। ये महत्वाकांक्षी कलमजीवी साहित्य में तो असफल हो गए , लेकिन वे पत्रकार बन गए। 

( टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित दो लेखों की कड़ी का पहला लेख - अँगरेज़ी से अनुवाद )


साभार वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल

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