एक सपना आंखें खुलने पे टूट जाता है एक सपना आँखे बंद होने पे टूट जाता है, शरीर एक रथ आत्मा एक रथी और मन घोड़ा, किस दिशा में ले जा रहा है ? संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में शहडोल - धनपुरी से पधारे महात्मा भैयालाल प्रजापति जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) सत्संग होता है जहाँ पे ये आत्मा परमात्मा को जानकर परमात्मा से नाता जोड़ लेती है। जीवन, धर्म और विश्वास के बीच डगमगाता रहता है। कभी किसी चीज में विश्वास, कभी किसी को धर्म मानना ये जीवन इसी में धीरे-धीरे गुजर जाता है। ये मन एक कनेक्टर है जो कभी विश्वास से भी जुड़ नहीं पाता और न ही धर्म से जुड़ पाता है। दोनों के बीच इधर-उधर, एक पेंडुलम की भांति झूमता रहता है। जब तक जीवन में तत्व-वेत्ता नहीं आते, जब तक इस निराकार साकार की इस जीवन में कृपा ही नहीं होती, जब तक ये रहम नहीं करता, तरस नहीं करता, अपने चरणों रूपी प्रकाश में नहीं चुन लेता तब तक ये जीवन न किसी चीज का विश्वास करता है और न ही धर्म का हो पाता है। जीवन बीत जाता है। निराकार हरि प्रभु परमात्मा जो अंग संग है, सर्वव्यापक है, करन करावन है, अपार है जिसके बिना एक कण में भी ऊर्जा नहीं आ सकती। ये जीवन इसके बिना जिया गया उसकी कोई कीमत नहीं, कोई कद्र नहीं, कोई मोल नहीं। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में अवतारवाणी के शब्द पर शहडोल धनपुरी से पधारे महात्मा भैयालाल प्रजापति जी ने उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
उन्होंने कहा इस निराकार हरि के बिना ये जीवन फीका-फीका है, आनंद नहीं आता। भले ही इस संसार में इंसान बहुत सारी सामग्रियों को इकट्ठा करता है सुखों के लिए। लेकिन, सामग्रियां शुरुआती दौर में तो सुख जरूर देती हैं, लेकिन बाद में वही सामग्रियां दुख का कारण भी बनती हैं। जिस प्रकार ये आँखें खुली हुई हैं, चारों तरफ देख रहा है सुन्दर नज़ारे दिख रहे हैं। लेकिन, ये भी एक सपने की भांति है। कितने सुंदर सपने सोते वक्त देखता है। लेकिन, जब आँखें खुल जाती हैं सपना टूट जाता है फिर देखता है चारों तरफ, अभी तो मैं खूबसूरत नज़ारे में था। खूबसूरत जगह पे था, स्थान पे था लेकिन अब कुछ नहीं नज़र आ रहा। उसी तरह आंखें खुली हैं, ये नज़ारे देख रहा है दुनिया के आनंद ले रहा है। लेकिन ये भी एक सपना है। एक सपना आंखें खुलने पे टूट जाता है। एक सपना आँखे बंद होने पे टूट जाता है। समय के मालिक, इस निराकार रूपी परमात्मा को दिखाकर, बोध करवाकर इस विराट प्रभु के साथ विराट होने के लिए ये ज्ञान देता है। जो वस्तु अलग होती है वो जब उसी में मिलती है, तब वो भी विराट होती है और आनंद भी आता है। यदि पानी में तेल डाल दें, तो कभी पानी में तेल घुलता नहीं या तेल में पानी डाल दें, तो भी कभी घुलता नहीं है आनंद नहीं ले पाता। उसी प्रकार, यदि मिट्टी को पैक करके किसी शीशी में ज़मीन में रख दें, तो मिल नहीं पाती। समुद्र के पानी को किसी शीशी में निकाल कर पैक करके फिर समुद्र में डाल दें, तो भी शीशी वाले पानी को कभी आनंद नहीं आएगा, क्योंकि परमानंद के साथ उसका जुड़ाव नहीं हुआ। उसी प्रकार, ये परमात्मा का अंश आत्मा जब तक इससे कनेक्ट नहीं होता, इससे जुड़ता नहीं है। कभी विश्वास, कभी भ्रम जीवन में बना ही रहता है। ऐसे इतिहास में भी बहुत सारे संतों के जीवन में ये भ्रम, विश्वास क्रम आता था। लेकिन जब भ्रम टूटा और विश्वास आया तो आनंद आया। श्रद्धा, भक्ति, विश्वास सद्गुरु बाबा हरदेव सिंह महाराज ने एक ध्येय भी रखा था।
दुनिया में इंसान अकेला आया, अकेला ही चला जाता है। कुछ दिनों के लिए साथ ज़रूर होता है यहाँ इस दुनिया में। लेकिन आया किसके लिए ? पाया क्या ? मन में क्या बसाया और मन क्या लेके गया ? जिस प्रकार कहते हैं कि शरीर एक रथ और आत्मा एक रथी और मन घोड़ा किस दिशा में ले जा रहा है ? किस दिशा में जाना है ? किस दिशा में ले जा रहा है ? यदि इसका कंट्रोल नहीं है। ये गढ़ में भी ले जा सकता है, खाई में भी गिरा सकता है। अंधकार में भी डाल सकता है। सद्गुरु जब भी विराट को दिखाता इससे जोड़ता है तो लोक भी सुखी होता है और परलोक भी सुखी होता है। क्या मन में रखता हूं मेरा प्रिय सब कुछ जानता है इसको पता होता है। इसलिए भक्त कुछ भी नहीं सोचता, सिर्फ इस निरंकार के साथ अपने मन का नाता जोड़े रखता है, अपने मन को इसके साथ जोड़कर, और इसी के ही जैसा ये संसार को देखता है, और जो देखता है, वो भावना आती है उसमें फिर ना कोई गैर ना कोई बैर। गुरु के ज्ञान की दृष्टि से जब मन देखता है, तो ये सब कुछ रचना, सब कुछ खेल, सब कुछ जीव जंतु सभी इसी की रचना है, सब कुछ इसी के हैं, इसकी किसी भी रचना का मैं निरादर करता हूं, गलत सोचता हूं तो कलाकारों के विषय में गलत सोचता हूं। कलाकार इस दुनिया में सब कुछ कला दिखा रहा है, इस कलाकार के विषय में गलत सोचता हूं। इसी को कबीर साहब कहते हैं, कि बुरा देखन जो मैं चला, बुरा न मिलिया कोए। जो अपने आप को देखा, मुझसे बुरा ना कोई। आत्म मंथन यही है कि मैं क्या सोचता हूं, मेरा ये मन रूपी कनेक्टर किससे कनेक्ट हो रहा है, किस चीज से कनेक्ट हो रहा, क्या सोच रहा है, क्या विचार कर रहा है ? आत्म मंथन करते चला जाता है कि मैं जिससे जुड़ा हूं, उससे मेरा जुड़ाव बराबर है या नहीं है। बाकी तो भक्ति मुक्ति इनके हाथ में हैं। गुरु चाहे तो बिना ज्ञान के भी मुक्त कर देता है, गुरु चाहे तो ज्ञान लेने के बाद भी मुक्ति नहीं मिलती। सतगुरु माता जी ने इन श्लोकों में फरमाया भी है कि ज्ञान लेकर ये नहीं कि मुक्त हो जाएगा। ज्ञान के साथ जीवन जीना, सही मायने में तभी मुक्ति होती है।
बाबा अवतार सिंह जी महाराज, उनके साथ जेआरडी सत्यार्थी जी और दो संत उनके साथ प्रचार यात्रा में ऐसी ही गर्मियों में पंजाब में यात्रा में निकले वो पगडंडी से ही चलने लगे। कोई दूर-दूर तक दिख भी नहीं रहा था उस गर्मी में प्यास लगी। चलते-चलते एक इंसान दिखा वो दो बैल लेकर कुएं से पानी निकाल रहा था वह खरबूजे और तरबूजे लगाया हुआ था। उसको सींच रहा था। बाबाजी वहां पे गए और वहां पे बैठे और बोले किसान भाई, पानी पिला दो। वह पहले बोला, आप ठहरो थोड़ा सा आराम कर लो। मैं तुरंत 5 मिनट में आया, वो तुरंत घर गया, कुछ दाल लेकर आया, लाई चने, गुड़ लेके आया। बकायदा बड़े अच्छे तरीके से उनकी सेवाएं की और उस कुएं का ठंडा-ठंडा पानी पिलाया। सभी ने खाया, पानी पिए और उसके बाद फिर वहां से बाबा जी ने कहा चलते हैं, जब आगे बढ़े तो सत्यार्थी जी ने बाबा जी से प्रश्न किया, बाबा जी, कुछ देंगे इसको भी ? तब बाबाजी ने कहा मैंने तो इसे दे दिया। इसने सेवा की, तन से किया, मन से किया, प्यार से किया। मैं इसको दे दिया। सत्यार्थी जी पूछ रहे हैं, "बाबा जी, आपने क्या दिया ?" बाबाजी बोले, "मैंने इसे मुक्त कर दिया।" सोचिए, उसे ज्ञान नहीं दिया बाबा जी ने। सिर्फ प्यार, सत्कार, और उनके प्यासेपन को देखकर। कितने प्यार से दाने लेके आया, भुने हुए दाने खिलाए, पानी पिलाया, प्यार से बैठाया उन्हें। इतने प्यार में उसने दिल जीत लिया सद्गुरु बाबाजी का। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने गीत विचारों के माध्यम से भी अपने भाव प्रकट किए।




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