सतगुरु कृपा कर जैसा तू चाहता है मैं वैसा चल पाऊं, हर एक में हमें गुण खोजना है, किसी की पीड़ा देखकर आपके हृदय में पीड़ा हो रही है तो आप इंसान हो, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में प्रचारक मनीषा नागदेव जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) एक-एक संत जब यहाँ मुस्कुरा रहा था, तो अंतर्मन से यही आवाज आ रही थी कि सच्चे पातशाह, तूने भी किस तरह एक-एक को दृष्टि डाल कर आशीर्वाद दिया है, यही कृपा है। कृपा सतगुरु की ही होती है, और ये हर पल हमारे अंग संग है। यहाँ शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी महाराज ने भी ये बात समझा दी कि गुरुसिख वही है जो पूरी दुनिया को इस रब की जान लेता है। जब हमारे अंदर जिज्ञासा पैदा होती है कि हम इस परम पिता परमात्मा के दीदार करें, और जब पूरण सतगुरु की शरण में जाते हैं तो सतगुरु हमें इस रमे हुए राम के पल भर में दीदार करवा देता है। ये उसकी कृपा हो गयी क्योंकि ये कृपा साध्य मार्ग है कर्म साध्य मार्ग नहीं है। हम अक्सर सुनते हैं कि न जाने कौन सा मेरा अवगुण भा गया जो इसने मुझे अपना लिया। पर इस लाइन पर अगर गौर किया जाए, तो गुरु को कभी अवगुण नहीं भाता, ना तो मुझमें ऐसा कोई गुण है जो हम अपने गुरु को रिझा सकें। ये तो इसका तरस हो गया, इसका रहम हो गया कि इसने हमे अपने चरणों से जोड़ दिया। हम पर कृपा कर दी कि जिस लक्ष्य को प्राप्त करने हम इस संसार में आए हैं वो लक्ष्य सतगुरु ने पूरा करवा दिया, उसने तरस खाया कि ये रूहें मुझे पाना चाहती है तो कृपा हो गई। हर पल इसके शुक्रगुजार रहें, हर पल खुद को वड़ भागी माने। क्योंकि कहने को तो कह देते हैं कि हम बहुत भाग्यशाली हैं, हमें पूर्ण सद्गुरु मिला, पूर्ण रहबर मिला जिसने हमें इस परम सत्ता से मिलाया। फिर अगर हम अपना आत्म मंथन करें, तो क्या वाकई में हम खुद को भाग्यशाली मान रहे हैं? क्या हम इस ब्रह्म ज्ञान की कद्र कर रहे हैं? ये मेरे अंदर सवाल होना चाहिए। क्या मुझे पल-पल ये महसूस होता है कि अभी भी मैं गुरु के मुताबिक नहीं चल पा रहा? अरदास निकलती है मन से कि सतगुरु तू कृपा कर कि जैसा तू चाहता है मैं वैसा चल पाऊं। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में अवतारवाणी के शब्द पर प्रचारक मनीषा नागदेव जी ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा यहाँ प्यार की बात आ रही है कि हर एक से प्यार करो, हर एक का सत्कार करो, प्यार बन जाओ। अगर ब्रह्म ज्ञान असल में प्राप्त कर लिया है और ये मेरे हृदय में बस गया है, तब तो मेरे अंदर किसी के लिए वैर, ईर्ष्या, नफरत जैसी भावनाएं होनी ही नहीं चाहिए। क्योंकि इस परमपिता परमात्मा को प्राप्त किया, तब सद्गुरु ने एक विशेष बात हमें समझा दी कि तू जहाँ भी देख रहा है, जिस ओर भी देख रहा है निराकार परमात्मा बसता है, हर एक घट में इसका अंश मौजूद है, हर एक घट में परमात्मा मौजूद है। तो साध संगत, जब हर घट में परमात्मा है, तो मेरे अंदर तो वो दृष्टि आ गई कि मैं हर जगह इसको देख सकूं। अगर मुझे दिख रहा है ये परमात्मा, तो सवाल ही पैदा नहीं होता कि मेरे अंदर किसी के लिए नफरत हो, कडवाहट हो, वैर हो, ईर्ष्या हो। और अगर आज भी मेरे अंदर यह मौजूद है, तो अर्थात यह ब्रह्मज्ञान मैंने जाना ही नहीं। तभी निरंकारी राजपिता जी ने कहा कि आप फिर से ब्रह्मज्ञान ले लो। इस ज्ञान को रिपीट कर लो, क्योंकि इस ज्ञान में इतनी गहराई है कि जितना-जितना हम इसके अंदर डूबते चले जाते हैं, उतना-उतना मेरे जीवन में निखार आता चला जाता है। जो गुरसिख अपना आकलन करना सीख जाता है, अपने अंदर की बुराइयां देखना सीख जाता है, अपनी कमियों को निकालना सीख जाता है, वही गुरु के मुताबिक जीवन जी पाता है।
सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने भी अपने विचारों में एक बार यह बात रखी थी कि एक बार एक ट्यूशन टीचर ने बच्चों को घर पे पढ़ाने के लिए बुलाया। तो सारे बच्चे जब पढ़ने आए, तो उस ट्यूशन टीचर ने कुछ गिलास और एक थर्मस में कॉफी बना के रख दी थी और वह गिलास कुछ कांच के थे, कुछ स्टील के थे, कुछ प्लास्टिक के थे। तो उस टीचर ने बच्चों से कहा कि, "ऐसा करते हैं, आज मैंने कॉफी बनाई है। आप लोग सब जाकर पहले कॉफी पी लो, फिर पढ़ाई करेंगे।" बच्चे खुश हो गए। जब बच्चों ने उन गिलास की तरफ देखा, किसी बच्चे को कांच का सुंदर लगा, किसी बच्चे को स्टील का अच्छा लगा, किसी बच्चे को प्लास्टिक का अच्छा लगा, वह बच्चे दौड़-दौड़कर एक-दूसरे को धक्का देते हुए अपना-अपना पसंदीदा गिलास उठाने लगे और उसमें उन्होंने कॉफी पी ली। तो "पहले बच्चों ने पूछा कि, 'मैम, आपने हमें आज कॉफी पहले क्यों पिलाई? ऐसे तो आप नहीं पिलाते हो?'" तो वह ट्यूशन टीचर आगे से जवाब देती है कि, "असली मकसद तो कॉफी पीना था, पर मैं देख रही थी आप सब बच्चों का असली मकसद अपने पसंदीदा गिलास को उठाना बन गया था। आपने एक-दूसरे को धक्का दिया, ठोकर मारी, अपना पसंदीदा गिलास उठाया और कॉफी पी ली, पर मकसद क्या था? कॉफी पीना, कॉफी का स्वाद चखना।" तो वह जो मूल था वह छूट गया और जो बाकी चीजें, उन पर ध्यान चला गया। तो कहीं यही हाल हमारा भी तो नहीं है कि जो यह मूल, ये निराकार परमात्मा मेरे सतगुरु ने मुझे मेरे जीवन में दे दिया है। मैं संगत तो आती हूं, संतों से भी मिलती हूं, सेवा भी करती हूं, इसका एहसास भी करती हूं पर जो मूल है यह निराकार परमात्मा, हम इसे भूल जाते हैं और उसके बाद किन छोटी-छोटी बातों में पड़कर अपनी स्वासों को बर्बाद करते चले जाते हैं। जो अमूल्य है, एक-एक श्वास में इस परमात्मा का सिमरन निकलना चाहिए, इसका एहसास होना चाहिए। जहां भी जाऊं, हर पल मुझे यह दिखाई दे। वाहेगुरु सच्चे बादशाह, तूने तो मुझे सुप्रीम पावर से जोड़ दिया कि मैं तो जहां जा रही हूं, यह मेरे साथ है। कभी किसी बात का डर न सताए, कभी अकेलापन महसूस न हो, क्योंकि सबसे बड़ा सच्चा साथी सतगुरु ने मुझे दे दिया है।
साधसंगत, अगर देखें तो संसार में भी यही हो रहा है, संसार में तो हम देखते हैं इधर-उधर की बातें ही होती हैं पर जिनको परमात्मा मिल गया, जिनको यह समझ आ गया कि मेरा जीवन केवल भक्ति करने के लिए मिला है, तो सतगुरु माताजी समझाते हैं, अपने हर एक फर्ज को निभाते हुए, अपनी हर एक रिस्पांसिबिलिटी को निभाते हुए, हमें इसका एहसास बना के रखना है। हमारा उद्देश्य केवल इसको प्राप्त करना है। तो इसको प्राप्त करने के लिए हम आगे बढ़े, हर पल इसका एहसास बना के रखें, हर श्वास में सिमरन हो। हमेशा जहां बैठे गुरु की बात करेंगे। सद्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज अक्सर यही बात समझाया करते हैं कि भगत तो वही होता है जिसके मुख से जब भी निकले, केवल गुरु की बात निकले। उसे न किसी में बुराइयां दिखाई दें, न किसी में कमियां दिखाई दें, उसे तो हर संत, उसका हर भगत अच्छा लगे कि वाह प्रभु, तूने कितने प्यारे संत बनाए हैं। हर एक में हमें गुण खोजना है। कोई जल्दी सेवा में आ जाता है, टाइम से, तो मेरे अंदर ये बात आ जाए कि वाह प्रभु, कितनी टाइम से सेवा में आ जाते हैं तू कृपा कर कि हम भी टाइम से आकर सेवा कर पाएं। किसी को देखें कि वो इस निराकार के एहसास में डूबा है, तो उस वक़्त भी ये अरदास निकले कि प्रभु तू मेहर कर कि जिस तरह ये तेरा संत भगत तुझे याद करता है हर पल, मेरे जीवन में भी ऐसा तेरा स्मरण आ जाए कि मेरी हर श्वास में तू याद हो। सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने ये बात स्पष्ट कर दी कि अगर आपको ये निराकार परमात्मा हर वेले याद होगा, तो आपसे कभी गलतियां नहीं होंगी। ये तो सत्य बात है। अगर मुझे ये परमात्मा याद होगा, तो अगर मैं किसी से बात भी कर रहा हूं, मुझे सामने परमात्मा दिखाई देगा, अपना सद्गुरु दिखाई देगा। तो कभी मुख से कड़वे वचन नहीं निकलेंगे। हम प्यार से, सद्भाव से बात करेंगे, सत्कार देते हुए, उसका आदर करते हुए, उससे बात करेंगे। न कटु वचन बोलेंगे न कभी उसका अपमान करेंगे, न कभी उसका दिल दुखाएंगे। क्योंकि बाबा जी अक्सर ये बात कहा करते हैं कि मुझे सबसे ज़्यादा दुख तब होता है, जब मेरा ही गुरुसिख, मेरे किसी गुरुसिख का दिल दुखाता है। हमें सद्गुरु को रिझाना है, उसे खुश करना है, उसकी मुस्कान के कारण बनना है।
उन्होंने कहा निरंकारी राज पिता जी ने उदाहरण देते हुए समझाया कि अगर किसी संत को सेवा मिली हुई है कि आप संगत को बिठा दीजिए और वो सेवादार संगत से कह रहा है बैठ जाओ पर अगर संगत नहीं बैठ रही, उस वक़्त उसकी बात नहीं मान रही, तो अगर वो गुस्से में उसकी बाह खींच-खींच के उसे बिठाने लग जाए, तो वो यही कहेगा कि मैंने तो सेवा निभा दी, मुझे अधिकारियों ने कहा था तुम संगत को बिठा दो, मैंने बिठा दिया तो सेवा तो निभा दी। पर क्या वो सेवा मर्यादित थी? क्या वो सेवा से मेरा गुरु खुश होगा? क्या गुस्से में किसी के साथ किया गया व्यवहार से मेरा सद्गुरु खुश होगा? उन्होंने समझाया कि हमें सेवा भी मर्यादित हो के करनी है प्यार से। और बाबा गुरु वचन सिंह जी महाराज तो ये बात स्पष्ट करते हैं कि प्यार से इस सारी दुनिया को जीता जा सकता है, आप प्यार करो। गलती बताने के लिए तो सतगुरु ने कहा ही नहीं है क्योंकि उन्होंने कहा कि अपने अंदर झांको। अपनी गलतियां निकालो। सद्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी कहते हैं गुस्सा नहीं करना, छोड़ दो। वो नहीं मान रहे हैं, उनको जाने दो जहां से जाना है। क्योंकि नियम और कानून इतने ऊपर नहीं होने चाहिए कि प्यार खत्म हो जाए। हमें प्यार का और नियम का बैलेंस बनाके चलना है। साध संगत के लिए भी निरंकारी राजपिता जी ने कहा कि ये जो व्यवस्थाएं हैं, जो सेवादार हैं, वो संगत के लिए बनाई जाती हैं। संगत की सुविधा के लिए बनाई जाती हैं। अगर आपको कोई सेवादार बोल रहा है तो आप अगर उनकी बात मानकर वैसा करते हो तो उसमें आपको सतगुरु का आशीर्वाद मिलता है और व्यवस्थाएं भी परफेक्ट हो जाती हैं। निरंकारी वो है जो कभी किसी में कमी ना देखें। निरंकारी वो है जो जात-पात के बंधन से ऊपर उठ जाए। निरंकारी वो है जो किसी को ऊंचा-नीचा करके, अमीर-गरीब करके ना माने। सबको एक निगाह से, सब तो मेरे परमात्मा के बंदे हैं, सब में मेरा प्रभु बसता है। जब हम ऐसे बन जाएंगे तब निरंकारी कहलाएंगे। बाबा जी एक बात और कहा करते हैं कि अगर आपको किसी की पीड़ा देखकर आपके हृदय में पीड़ा हो रही है। आपको यह एहसास हो रहा है कि कैसे भी मैं इसकी मदद करूं, सेवा करूं, तो अर्थात आप इंसान हो। सत्संग के अंत में उन्होंने दूर देशों में हो रहे युद्ध को खत्म करने की प्रार्थना भी की। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने गीत विचार के माध्यम से भी अपने भाव प्रकट किए।

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