ए मन मेरे, भक्ति से ही जीवन में सुख आएगा, अगर नहीं है भक्ति, तो फिर नीरस ही रह जाएगा, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग कार्यक्रम में प्रचारक सुमन चावला जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी ( मुरली पृथ्यानी ) संपूर्ण हरदेव वाणी का फरमान आया है कि ए मन मेरे, भक्ति से ही जीवन में सुख आएगा, अगर नहीं है भक्ति, तो फिर नीरस ही रह जाएगा। इस मन के लिए कहा गया कि ए मन, भक्ति से ही जीवन में रस आएगा, क्योंकि ये मन ही है जो नाच नचाता है और सद्गुरु की कृपा से सच्चे पातशाह ने जब मेहर किया, ये ब्रम्ह ज्ञान की दात हमारी झोली में डाली, पहले ही प्रण में तन, मन, धन निरंकार को समर्पित कर दिया। ये मन ही है जो इंसान को नाच नचाता है, ये मन ही डाँवा डोल करता है। कहा गया कि जीवन में रस आएगा ये नहीं कहा कि पल दो पल, कुछ मिनट, कुछ घंटे जीवन में रस आएगा। अगर नम्रता जीवन में है, पावनता जीवन में है, तो ये भक्ति का आनंद जीवन में बना रहता है, बरकरार रहता है। जब सतगुरु ने रहम किया ये ब्रम्ह ज्ञान हमारे जीवन में दिया, हमारी झोली में डाला तो ये आत्मा कह उठती है आनंद भया जदो सतगुरु में पाया। मुझे आनंद आ गया जब से मेरे जीवन में सतगुरु आया। इस ब्रम्ह ज्ञान को पाने के लिए देवी देवते भी तरसते हैं। इतना पावन ज्ञान सतगुरु ने हमारी झोली में डाला है। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग कार्यक्रम में पवित्र हरदेव वाणी के शब्द पर प्रचारक सुमन चावला जी ने उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
उन्होंने कहा निरंतर ही संत कल्याण यात्राएँ कर रहे हैं, हम सब का कल्याण करने के लिए, यात्राओं के दौरान अमृतसर से पधारे महात्मा जी जब रीवा पहुंचे तो दासी ने अपने भाई बहनों से बात कि आप जी आज संगत गए थे तो कुछ विचार बताएं क्या सुन के आये ? तो इतने आनंद की अवस्था उनकी देखने को मिली, सुनने को मिली कि बात करते करते ही उनकी आँखें भर आईं कि इतना जो हमें पावन ज्ञान मिला है, इस ज्ञान को अगर हम जीवन में जीते हैं तो हमारे जीवन में एक अनुभव तो हमने ये किया है कि हम कहीं भी रहते हैं, तो हमारा ये मन इस निरंकार से जुड़ा रहता है। तो ये मन हर पल आनंद की अनुभूति करता है। जो संगत में जा के बैठे और सतगुरु के चरणों में नमस्कार की। एक प्रार्थना, एक अरदास कर के बैठे कि सच्चे बादशाह कृपा करना कि जो भी विचार आएं वो मेरे लिए ही आएं। जो भी मैं सुनूं वो मैं अपने जीवन में अपनाऊं। तो बता रहे थे कि सारी कायनात के लिए सद्गुरु आये हैं। पूरा सद्गुरु जिसके ऊपर अपनी मेहर लुटाता है, सुख और आनंद वाला जीवन जग में वही बिताता है।
जिन प्रेम कियो, तिन ही प्रभु पायो, सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज, जब कल्याण यात्रा पर जाते थे तो गाड़ियां मुड़ जाती थीं किसी कस्बे की तरफ, किसी गली की तरफ क्योंकि कोई भक्त पुकार रहा है। इतनी पावन भक्ति जो संतों ने हमें सिखलाई है, इतिहास गवाह है, शास्त्र पढ़ते हैं निरंतर पढ़ भी रहे हैं, सुन भी रहे हैं भगत सुदामा की जीवनी, मां मीरा की जीवनी, भक्त शबरी जी की जीवनी। निरंतर सुन रहे हैं, क्योंकि इनके जीवन में जो ज्ञान आया, उस ज्ञान को समझा। उस ज्ञान की गहराई को समझा, पूर्ण सतगुरु की शरण में आके, इस ज्ञान को समझा। उसके बाद उस ज्ञान को मनन किया, जो शास्त्रों में इस निरंकार का ज़िक्र भी है। हम शास्त्र पढ़ते हैं, तो इन शास्त्रों में निरंकार का ज़िक्र भी है। सुखमणि साहेब भी कहती हैं "निरंकार, ब्रह्म ज्ञानी का सकल आकार, ब्रह्म ज्ञानी आप निरंकार।" निरंकार का ज़िक्र है। निरंकार सतगुरु ने हमें अंग संग दिखाया है। इन पर टूट विश्वास करना है, क्योंकि ये हमारे नज़दीक हैं, करीब हैं। हम हर पल इस निरंकार दातार के पालने में हैं, झूले में झूल रहे हैं। ये नाम खुमारी हमारे ऊपर हर पल चढ़ी होनी चाहिए। प्रभु श्री कृष्ण भगवान जी कहते हैं कि मैं निरंकार हूं। प्रभु श्री कृष्ण भगवान जी जब अर्जुन को ज्ञान देते हैं, "मैं हूं निराकार, मेरा रूप है न रंग है, कहीं से आरंभ न हूं, न कहीं पे समाप्त हूं।" सोचने वाली बात कि कहीं से न आरंभ हूं, न कहीं पे समाप्त हूं। जब इस निरंकार पार ब्रह्म परमात्मा की हम याद में खो जाते हैं तो आनंद की अवस्था बनती है।
संत आवाज़ देते हैं कि आओ रब के दर्शन कर लो, संदेशा है इंसानों को। आओ, परमात्मा के दर्शन कर लो। निरंतर आवाज़ दिए चले जा रहे हैं। शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी महाराज जब संगत जाते थे, तो आवाज़ देते जाते थे। जो भी गुरु सिख मिले, उनसे कहते कि, "भाई, आप संगत में चलो।" जिस तरह हम अपने मन की सुन लेते हैं, कभी मन नाच नचाता है। पहले से मन को समझा देते हैं कि घर में आज ये कार्य रखे हैं, कैसे जा पाएंगे संगत ? मन नाच नचाता है। हम शेड्यूल बनाते हैं। हम कौन हैं शेड्यूल बनाने वाले ? जब ये मन परमात्मा को दे दिया, इसे सौंप दिया। एक अरदास इस निरंकार के आगे करें कि "सच्चे पातशाह, मेरा दिन आपके हवाले है, मेरी रात आपके हवाले है।" दिन को फिक्र होती है आधे घंटे बाद कुछ खाना है, एक घंटे बाद कुछ खाना है। रात को जब सोते हैं, कितने घंटे सोते हैं ? कौन सुला रहा है ? कौन पाल रहा है ? कौन सांस चला रहा है ? गहराई से सोचें। यह स्वासों का मालिक कोई डॉक्टर बता पाएगा कि आपकी सांसें कहां हैं ? कहां से ये चल रही हैं ? निरंकार के एहसास में जब भगत जीवन जीता है, अपने आपको सौंप देता है, समर्पित कर देता है, अर्पित कर देता है। इस निरंकार के हवाले अपने आपको कर देता है तो जीवन में आनंद आता है।
शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी महाराज कहते थे, "मैंने लाखों अवतार पैदा कर दिए हैं" साध संगत जी, हमारे ऊपर असीम कृपा हुई है। सतगुरु ने ये ब्रह्म ज्ञान दे के हमें सुखी कर दिया है। समझा रहे हैं तब तक भक्ति ज्योत जले ना, जब तक भीतर मान है। कहे हरदेव कि नम्र बनेगा तो भक्ति परवान है। बच्चे बनेंगे तो बचे रहेंगे। नम्रता को अपनाना है, प्रेम को अपनाना है। सहनशील बनना है। करुणा, दया, विशालता ये संतों के गहने हैं। साध संगत जी, सद्गुरु के चरणों में अरदास करें कि ए सच्चे बादशाह, ए दीन दयाल, आप दया करना, रहम करना कि जिन के जीवन में ज्ञान नहीं है। आप उनको ज्ञान बख्शना। हर एक के ऊपर कृपा बना के रखना। सारी संगत के लिए अरदास कि सभी के जीवन में खुशियाँ देना, बरकत देना सेहत सबकी बनी रहे नित्य प्रतिदिन सेवा, सिमरन, सत्संग करते हुए अपना लोक-परलोक सुखी करें। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने भी गीत विचार के माध्यम से अपने भाव प्रकट किए।

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