हमें प्रकृति दिखाई दे रही है, लेकिन इस प्रकृति का मालिक इन चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देगा, सद्गुरु उसको जानिए जो सच का बोध कराता है, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में बालाघाट से पधारे महात्मा जगन्नाथ टेम्भरे जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) सद्गुरु ने सामने नौ माया रख दी। ऊपर देख रहे हैं हम सूरज, चांद, सितारे। नीचे देख रहे हैं धरती, अग्नि, जल और बीच में देख रहे हैं जीव, वायु, और आकाश। इतनी तो माया है। ये नौ माया से ही यह ब्रह्मांड है। कोई कहे कि इसके अलावा दसवीं और कुछ है, तो नौ ही हैं। अब मिलाओ, इस निरंकार की निशानियां इन पर मिल रही हैं। जितने भी हमें पिंड दिख रहे हैं, ये ब्रह्मांड में एक नहीं, अनेक हैं। परमात्मा एक है, और ये पिंड अनेक हैं। हजारों सूर्य मिल जाएंगे, हजारों चंद्रमा मिल जाएंगे। हजारों ऐसी पृथ्वियां होंगी, हजारों पृथ्वियों पर जीवन भी होगा। असंख्य तारे हैं। वो तो एक ईश्वर नहीं हो सकते। यहां पर सूरज, चांद, सितारे, धरती यह ईश्वर नहीं है। इसके अलावा अग्नि है, जल है, हवा है, आकाश है। ईश्वर सर्वव्यापी है, लेकिन ये जो चीजें हैं, ये सर्वव्यापी नहीं हैं। ये यहां तो हैं पर वहां नहीं हैं। लेकिन परमात्मा, निरंकार, यहां भी है वो सर्वज्ञ है। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में हरदेव वाणी के शब्द पर बालाघाट से पधारे महात्मा जगन्नाथ टेम्भरे जी ने साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
उन्होंने कहा सद्गुरु की परिभाषा बाबा हरदेव सिंह जी महाराज बता रहे हैं कि सद्गुरु उसको जानिए जो सच का बोध कराता है। हमें विवेक दिया गया है, निर्णय की क्षमता दी है कि आखिर ये सच क्या है ? क्या मैं इन आँखों से जो देख रहा हूँ, ये सच है ? या जो इन आँखों से नहीं दिखाई दे रहा है, वह सच है ? आखिर सच क्या है ? हमें प्रकृति दिखाई दे रही है, लेकिन इस प्रकृति का मालिक इन चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देगा। अज्ञानता के कारण मन में भ्रम है, पर भ्रम के कारण ही मनुष्य किसी भी चीज़ का रूप-रंग देख लिया है, आकार में ही खुश हो करके कहता है, "मेरी भक्ति शुरू हो गई है।" लेकिन जब समय के पूर्ण सद्गुरु आते हैं, तब समझाते हैं कि जो दृश्यमान जगत है, ये रचना है मेरी, ये माया है, और आपके शारीरिक तौर पर जीवित रहने के लिए ये आवश्यक है। मूल तो मेरा जो स्वरूप है वो निराकार है और तुम्हारा भी जो स्वरूप है, वो भी निराकार है। तो ऐसे परम तत्व की जानकारी करा दे, जो सच के साथ जोड़ दे, जो हमारे भ्रम निकाल दे। कहते हैं कि उसे सद्गुरु जानिए।
संसार में भ्रम है कि परमात्मा ये है कि वो है, लेकिन सद्गुरु ने इसकी निशानियाँ पहले रखी। देखो, इसकी निशानियाँ क्या हैं ? ये एक है। ये सर्व-व्यापक है। इसका कोई रंग-रूप, आकार नहीं है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता, कभी नहीं हुआ परिवर्तन। श्री कृष्ण जी के मुखारविंद से जो शब्द निकले कि, "नैनं छिदन्ति सस्त्राणि, नैनं दहति पावकः, न चैनं क्लेदयन्त्यापो, शोश्यति मारुतः" बोले, "मेरा जो विराट रूप है इसकी चार ये विशेषताएँ हैं कि अस्त्र-शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, पानी भिगो नहीं सकता, हवा उड़ा नहीं सकती।" सब खोजो इस ब्रह्मांड में। ऐसी ये जितनी निशानियाँ हैं, ये मिल जाएँ, तो समझो कि परमात्मा है।
जब हम इस परम सत्ता निरंकार के दर्शन कर लेते हैं, और जब इसको मैं देख रहा हूं, तो आत्मदर्शन भी मैं कर रहा हूं। ये निरंकार कहता है कि जब मनुष्य मेरे दर्शन कर लेता है तो फिर सहज में अपने स्वरूप को भी प्राप्त कर लेता है। अब मुझ तुम में कोई भेद नहीं है। सद्गुरु यही करता है हमें ज्ञान की रोशनी दे दी। बीच में पर्दा था, पर्दे को हटा दिया और इसके दर्शन कर लिए। कहते हैं न कि "सम्मुख होई जीव मोई जब ही", कि परमात्मा कहता है कि ये जो जीव है, सम्मुख होई जीव मोही जब ही, कोटि जन्म अघ नास तब ही, अनेकों जन्म जन्मांतर के पाप होंगे, तुरंत खत्म हो जाता है बस इसे हमारा स्वभाव भी पसंद आना चाहिए। "निर्मल मन जन सो ही पावा, मोही कपट छल छिद्र न भावा" अगर ऐसा स्वभाव है तो ठीक है। इस रूप से जब सतगुरु के सम्मुख रहते हैं। अपनी मैं इसमें विलय हो गई अब मेरा मुझमे कुछ नहीं जो कुछ है सो तेरा। भले ही दुनिया पागल कहे। लोग कहे, "मीरा भी बावरी।" लेकिन वो तो भक्ति में मस्त थी।
अप्रैल का महीना आए और बाबा गुरु बचन सिंह की याद ना आए ऐसा हो नही सकता। उनकी सिखलाई याद ना आए। उनकी सिखलाई का हमारे मन में आना ही उनकी याद है। उनकी वाणी, उनकी शिक्षा सहज ही मन में आ जाती है। संतों ने हर समय यही सीख दी संतों का संग करना, संतों की वाणी सुनना। अपनी चतुराई, चालाकी छोड़ करके बैठना, सरलता से बैठना, निश्चिंत होकर के बैठना, तो संतों की वाणी हमारे जीवन में असरकारक होती है। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने गीत विचारों के माध्यम से भी अपने भाव प्रकट किए।



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