"जो बोओगे वही आपको काटना पड़ेगा, वही आपको खाना पड़ेगा" किसी को दुखाने में फिर यह छोड़ने वाला नही है, यह सब देखने वाला होता है, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में महापुरुष नोतनदास केवलानी जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई। ज्ञान के बाद इंसान के लिए दूसरों का हित करना सबसे बड़ा धर्म है, दूसरों को पीड़ा देना, अधर्म है। सद्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज कहा करते थे, "जो बोओगे वही आपको काटना पड़ेगा, वही आपको खाना पड़ेगा।" समझ जाइए। इसमें कितना राज छिपा हुआ है। क्या हम ज्ञान के मुताबिक जीवन चल रहे होते हैं ? सेवा ही मूल होती है, संतों का सत्कार करना, इसका सत्कार है। आपको सद्गुरु ने इस निराकार ब्रह्म ईश्वर परमात्मा का बोध करा दिया, ज्ञान के बाद इंसान हर प्रकार से सुखी होता है। धन इसके हाथ में है। सुख इसके हाथ में है। सम्मान इसके हाथ में है। ईश्वर से बढ़कर कोई चीज नहीं है। गुरु बिन नहीं सूझे, हरि साजन सब के निकट खड़ा, जिन्होंने ज्ञान लिया है सिमरन कर लो, निराकार का सिमरन करके हर राहत मिल जाएगी, सब के साथ सम्मान करो। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में अवतारवाणी के शब्द पर महापुरुष नोतनदास केवलानी जी ने उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
आगे उन्होंने कहा सद्गुरु बाबा हरदेव जी महाराज ने कहा सभी पैगम्बरों ने आशीर्वाद दिया है सबसे पहले साधु का वचन जो है सुनना और सुनाना है, क्या हम कर रहे हैं ? पांव से चलकर संगत आना, कर से सेव कमाना, आंख से दर्शन पाना। रसना से हरि यश गाना, श्रद्धा भाव से गुरुचरणों से सिर झुकाना, ये कर्म कमावे जो गुरसिख तीनों सुख वह पाएगा। ग़रीब हो अमीर हो किसी भी जात का क्यों न हो, सब के साथ सद व्यवहार करो। सबके अंदर आत्मा है, ये सब देख रहा होता है चारों तरफ है। तीन लोक नौ खंड में, गुरु से बड़ा नहीं कोय, कर्ता करे न कर सके, गुरु करे सो होए, सद्गुरु मामूली बात नहीं होती। आपसे, यही विनती है, ज्ञान लिया है, अमल में लाओ। नहीं लिया है, ज्ञान ले लो। धन इसके हाथ में, सब इसके हाथ में है। खूब मेहनत करो कमाओ, लेकिन दो चीज़ों का ध्यान रखो। संगत में आया करो, और सबके साथ सद व्यवहार करो। जैसा कर्म करेंगे, किसी को दुखाने में फिर यह छोड़ने वाला नही है। यह सब देखने वाला होता है यह मेरा बंदा है, सेवा कर रहा होता है। समय से संगत में आओ। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने गीत विचारों के माध्यम से भी अपने भाव प्रकट किए।

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