हर समय इस निराकार से जुड़े रहें और जुड़ाव कब आता है जीवन में ? .. मैटेरियलिस्टिक लाइफ और स्पिरिचुअल लाइफ में भी बैलेंस बन सकता है, कैसे ? .. मन में सेवा का भाव नहीं, तो वह सेवा, सेवा नहीं है .. रुहानियत की खुराक भी इस आत्मा के लिए ज़रूरी .. सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के अनमोल विचारों का संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में हुआ प्रसारण
कटनी (मुरली पृथ्यानी) संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में प्रत्येक माह के पहले रविवार को सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज जी द्वारा देश विदेश में सम्पूर्ण मानव जगत के लिए दिए गए अनमोल आध्यात्मिक वचनों का प्रसारण प्रोजेक्टर के माध्यम से किया जाता है। इससे पहले राजपिता रमित जी द्वारा दिए गए आध्यात्मिक संदेश का प्रसारण किया जाता है जिसमें मानव मन में उठने वाले कई प्रश्नों का उत्तर बड़े ही सहजता से प्राप्त हो जाता है। इसी कड़ी में आज पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात के दुबई में दिए गए अनमोल वचनामृत का प्रसारण साध संगत के समक्ष किया गया। पाठकों के लिए सद्गुरु वचनामृत के अनमोल अंश -
हर समय इस निराकार से जुड़े रहें और जुड़ाव कब आता है जीवन में ? कि पहले निराकार को साक्षात देखकर फिर हर समय इस निराकार का एहसास, भक्ति भरा जीवन इस तरह से शुरू करके, हर पल में ही हो भक्ति, हर पल में ही सेवा एक सुदृढ़ एहसास रूप। हर समय यही एक बात पर ज़ोर के, अपने जीवन में आत्म मंथन करके हर समय एक स्थिर जीवन जिया जाए, एक सहज जीवन जिया जाए। जब मनुष्य जीवन मिला है, तो इसी जीवन में एक अपनी पहचान की जाए कि इस शरीर में तो खत्म हो जाना है कुछ सालों में।
सत्संग परिवार का मेंबर कर ले और जीवन हमारा सुधर जाए, ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि जिस तरह खाना हमें अपना खुद खाना होता है ताकि हमारे शरीर में ताकत रहे, उसी तरह यह रुहानियत की खुराक भी इस आत्मा के लिए ज़रूरी और हर एक को अपनी भक्ति ही करनी है।
आज का समय अगर हम देखें तो यह AI की बात, कहां हम आंखों से तो अब चीजें देख भी रहे हैं। पर वह भी इतनी ऑथेंटिक है नहीं, कितना उसमें भी मिलावट आ चुकी है। एक किस तरह चीजें क्या और दर्शाएं कैसे जाते हैं। एक पहले असली खुद वह क्या चीज है क्या नहीं, पहले अपनी फैक्ट चैकिंग करें देख के। और आज जो फैक्ट चैकिंग के नाम पर भी वह आंखों से देखकर भी कुछ गलत भी देख सकते हैं। तो अब ऐसे समय में जहां इतना कुछ है, कोई भी चीज अपने हिसाब से किसी में किस तरह दर्शा दे और वह एक हमने माननी है, नहीं माननी, तो... वो जो ऐसा एक माया कार्य आजकल चल रहा है, उससे फिर बचने का भी साधन क्या है ? किस तरह एक सच्चाई को आज भी, इतनी बिजी लाइफ में, इतनी सुपरफिशियल लाइफ, जो हर एक की हो गई है, या बहुत ही मेकेनिकल कामकाज, भागना, एक मशीन बनके की, बस वह बार-बार हर एक का यह भी एक कहना कि परिवार को इतना समय नहीं दे पाते, काम में ही दिन निकल जाता है। तो बस वही कि हर तरह की इंफॉर्मेशन जीवन में आती रहेगी, कुछ सही, कुछ गलत। और अब यह चुनाव हर एक का, यह एक चॉइस हर पल में, हर एक के पास है, जहां एक अगर अहम, एक प्रायोरिटी, एक इम्पोर्टेंस हम देते हैं। अगर कामकाज की भी, वही बैलेंस लाइफस्टाइल की भी बात होती है कि एक परिवार को भी उतना समय, सिर्फ एक करेक्ट प्लानिंग से, कुछ टाइम मैनेजमेंट से जहां काम को भी समय दिया, घर परिवार को भी समय दिया जा सकता है। वही अगर यह बात आती है और बैलेंस की, तो यह मैटेरियलिस्टिक लाइफ और एक यह स्पिरिचुअल लाइफ में भी बैलेंस बन सकता है। कैसे ? हर कोई अपने जीवन में एक वही भाव कि एक प्रैक्टिकल स्पिरिचुअलिटी को जगाता है कि हर पल में जब एक आध्यात्मिकता डाल देते हैं, तो काम कुछ भी हो रहा होता है, जीवन कि एक दिन की, कोई भी एक्टिविटी चल रही हो। उस एक्टिविटी को ही एक रुहान से जुड़कर, रुहानियत से भरपूर किया जा सकता है। हर कोई सोशल एक्ट भी एक स्पिरिचुअल एक्ट बन सकता है।
परमात्मा का दिया आगे औरों तक पहुंचा रहें है, तो यह अहंकार से रहित भाव ही सेवा के भाव होते हैं। वरना तो फिर वह एक्ट अगर सेवा का भी है, पर एक मन में सेवा का भाव नहीं, तो वह सेवा, सेवा नहीं है। कैसे कि हम सत्संग में अगर आपके बैठ भी गए हैं, पर ध्यान ही इधर-उधर है। एक मन स्थिर हो के यह जो भी सत्संग में सुना जा रहा है, उनको जीवन में नहीं उतार रहे, या फिर वह एक सिर्फ इसलिए आ गए कि घर परिवार वालों के साथ आ गए। वरना कोई बुरा मानेगा, पर हम अपनी तरफ से नहीं आए, तो वह सत्संग, सत्संग नहीं है, वह तो बस एक काम हो गया, वह एक क्रिया हो गई, वह एक एक्शन बस कर दिया। तो बात वही कि फिजिकली जितना एक सत्संग में होना जरूरी है, और उससे ज्यादा यह मन सत्संग, में लगा होना जरूरी है।
हम आना तो चाहते हैं, सत्संग पर किसी दिन एक्सेप्शनली शायद कोई ऑफिस की रिस्पॉन्सिबिलिटी, कोई घर की रिस्पॉन्सिबिलिटी आ गई और यह सत्संग नहीं हो पाया। तो भी अगर यह मन में भाव चल रहा है कि सत्संग जाना था, पर सबब नहीं बन पाया, तो भी यह मन तो सत्संग ही कर रहा है, चाहे ऑफिस ही बैठा है।
एक समय में हमारे पास अगर एक दिन के 24 घंटे भी हैं, उनको किस तरह से यूटीलाइज करना है ? भक्तों ने जहां यही दिखाया कि अपनी रेस्पोंसिबिलिटी के बावजूद भी एक स्पिरिचुअलिटी को मजबूत किया जा सकता है। हर वक्त और वही वह चॉइस उन्होंने भी अपने जीवन में भी इंप्लीमेंट की, और वही दूसरी तरफ, अगर ये मन निराकार से नहीं जुड़ा, तो एक सेकंड भी उन 24 घंटे में वो समय नहीं निकाला जाएगा। तो भक्तों ने हमेशा एक पैरामीटर जो चुनाव का बनाया है, वो निराकार को ही एक सेंटर पॉइंट रख के एक प्रियॉरिटी बनाकर रखा है कि जो भी चीज हमें बहुत ही इजी सलूशन भी, कि जो भी चीज हमें इस निराकार से करीब रखती है, वो चॉइस भी सही है।
आत्मा पे वो रंग अलग-अलग दुनिया के चढ़ रहे हैं, तो कैसे वो रंगों को हटाके, बस उस निराकार का एक पक्का रंग चढ़ाना है, तो हर कोई अपने जीवन में इसी तरह निराकार का आसरा लेकर, एक पक्के रंग में, इस गहराई में, इस सच्चाई में ही रंग आए, जैसे जगह का नाम भी दुबई है। तो जो भी डूब गया दुबई, जो भी डूब गया वही पार, तो यह डूबना बहुत जरूरी है, वरना एक ऊपर ऊपर रह जाएंगे।
जो अगर होता है, वही बाहर आता है, तो जब खुद ही प्यार बन के रहेंगे, तो हर एक को प्यार ही बाटेंगे, फिर दिमाग ये नहीं सोचेगा कि उस इंसान का मेरे प्रति क्या व्यवहार रहा। अगर वो बुरा रहा, तो बुराई भी करनी है, नहीं, हमें तो हर समय एक प्यार ही बांटना है, एक अच्छाई ही फैलानी है, और ये फिर सेलेक्टिव नहीं, लोगों के साथ, हर किसी के लिए अपने आप ही बनता जाएगा, ये स्प्रेड होता जाएगा, ये विस्तार होता जाएगा। परमात्मा के एहसास में रह के, अपनी भक्ति को और मजबूत करते रहें।


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