"हंस मोती चुनता है और परम हंस सिमरन के मोती चुनता है" जब वह नज़र मिल जाएगी, ब्रह्म ज्ञान मिल जाएगा तो परमात्मा हर जगह नज़र आने लगेगा, संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में प्रचारक रेखा बालानी जी ने विचार व्यक्त किए
कटनी (मुरली पृथ्यानी) बाबा गुरुनानक जी से किसी गुरसिख ने पूछ लिया, "बाबा जी, आप जब किसी गुरसिख पर बहुत खुश हो जाते हो, तो आप क्या देते हो ?" तो बाबा नानक जी कहते हैं, "मैं उसे कोई धन, दौलत, महल नहीं देता। मैं उसे लाकर सत्संग में बिठा देता हूं। क्योंकि सच्चा धन तो सत्संग से ही मिलता है।" आज माया का बहुत जोर है, माया में ही काफिर बंदे जन्म गवां रहा। हीरे जैसा जन्म मिला है, देवी देवता भी तरसते हैं कि हमें भी मनुष्य जन्म मिले, हम भी भक्ति करें सतगुरु की शरण में जाकर और आवागमन के चक्कर समाप्त करें। तभी तो महापुरुष जी हमेशा कहते हैं, "कि समय से आकर संगत में बैठ जाओ। क्या पता किस मुख से कौन सा वचन निकल जाए और हमारा जीवन ही बदल जाए।" इंसानी जन्म मिला है सभी सफल कर लें, क्योंकि बारम्बार मिलने वाला नहीं है। 84 लाख योनियों के बाद इस जीवात्मा को यह मनुष्य जन्म मिला है। इस जन्म को पाकर अगर रब को नहीं पाया, तो खाली हाथ आए, खाली हाथ ही चला जाता है। इसलिए हर युग में आवाज दी गई, कि इस परमात्मा को जानो, इसकी भक्ति करो। समय गया, फिर हाथ नहीं आएगा। उक्त विचार संत निरंकारी सत्संग भवन माधवनगर में रविवार के सत्संग में अवतारवाणी के शब्द पर प्रचारक रेखा बालानी जी ने उपस्थित साध संगत के समक्ष व्यक्त किए।
साधसंगत, पूरी जानकारी प्राप्त करके ठहर जाना ही पूजा पाठ है। लोग कहते हैं, "हम तो कभी मुंह झूठा नहीं करते, जब तक हम पूजा ना कर लें।" पहले पूरी जानकारी हासिल तो कर लें कि परमात्मा कहां नहीं है। सभी तो बोलते हैं, "सर्वव्यापी है, कण-कण में, हर जगह, पत्ते-पत्ते में है," पर दिखाई क्यों नहीं देता? हमें क्यों नहीं दिखाई देता? जब वह नज़र मिल जाएगी, ब्रह्म ज्ञान मिल जाएगा तो यह हर जगह नज़र आने लगेगा। हर कण में, हर पत्ते में दिखाई देने लगेगा। आप सब बड़े भाग्यशाली हो कि परमात्मा की जानकारी मिल गई, भक्ति करने का अवसर मिल गया, दौड़-दौड़कर सत्संग आएं जितना हो सके, संसार के कार्य तो बाद में हो सकते हैं। अगर संगत का समय गया, वह फिर बाद में नहीं मिलता। इसका लाभ पूरा-पूरा प्राप्त कर लें। सबसे ज़रूरी है, सत्संग, सेवा, सिमरन। संसार का धन तो दिखाई देता है, आंखों से उसको महत्व देते हैं पर यह जो हमारे खजाने में जमा होता जाता है, यह जो हमारे ही से आता है। हम इस धन को बांट नहीं सकेंगे। यह हमारे ही से है। संसार का धन तो बांटा जाएगा। पर यह आत्मिक धन, यह हमारे ही से आता है। सतगुरु बाबा जी भी कहते हैं कि जो भी गुरसिख इसे पूर्ण मानता है, पूरा ध्यान देता है, वह पूरा हो जाता है।
साधसंगत, बाबा जी के विचारों में आया था कि नदी के पास एक पेड़ है। पेड़ को नदी से नमी मिल रही है। वह कहता है, "मुझे तो नमी मिल रही है, बारिश की क्या ज़रूरत है?" इसी प्रकार इंसान कहते हैं, "हमें तो ब्रह्म ज्ञान मिल गया, अब सत्संग की क्या ज़रूरत है? रोज-रोज हम सत्संग में क्यों जाएं?" तो जब बारिश होती है, उस पेड़ के पत्ते जिसका कलर भी ढक जाता है पूरा धूल से, बारिश के कारण वह साफ हो जाता है। वह पत्ते हरियाली से नज़र आने लगती है, उसके असली रूप में नज़र आना इसी प्रकार सत्संग में आते हैं तो हम अपने मूल से जुड़ जाते हैं। यह हमारी आत्मा इस मूल से जुड़ जाती है कि हमें इस संसार में भेजा क्यों गया? कि अपने मूल की जानकारी प्राप्त करके, इस रमे नाम से जुड़कर, इस परमात्मा से जुड़कर अपना जीवन का सफर तय करना है।
साधसंगत, 1995 में शहडोल शहर से कटनी आई। कटनी में जब पुराने भवन में संगत हुआ करती थी, जाती थी मैं। महापुरुषों जी के चरणों में जाती थी, क्योंकि 14 साल में 14 मकान बदले, किराए के मकान थे। 14 मकान बदले। अब यह शरीर थक गया था। रोते-रोते महापुरुषों के चरणों में गए। सच्चे पातशाह आप कृपा करो, रहमत करो, आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। साध संगत महापुरुषों ने ऐसी अरदास की आठ दिन में मुझे मकान अपना मिल गया। ऐसी रहमत सच्चे पातशाह की, और विश्वास मजबूत होता गया कि परमात्मा हर जगह है। सतगुरु माता जी भी कहते है, "आपको जो भी चाहिए, किसी गुरुसिख के चरणों में जाकर नमस्कार करके आप बोलो।" कितनी कृपा, कितनी अपार, रहमत सतगुरु ने की जो हम सभी को चुना है सतगुरु ने। 14 मकान बदलने से शरीर थक गया, तो ये आत्मा तो कई जन्म से ये मकान बदलती आ रही है। जब अपना मकान मिल गया, संतुष्ट हो गए। तो ये आत्मा भी तो संतुष्ट होना चाहती है। ये आत्मा ही तो चोला बदलती है, जिस प्रकार श्रीकृष्ण कहते हैं, "हम कपड़े बदलते हैं," इसी प्रकार ये आत्मा भी कपड़े बदलती है। तो हम अपने निज घर को प्राप्त कर ले। इस रमे राम के दीदार कर ले, फिर हम जहां भी जाएं। आठों पहर इस आनंद को अनुभव करें।
"हंस मोती चुनता है और परम हंस सिमरन के मोती चुनता है। हंस उड़कर दरिया पार कर लेता है और परम हंस भव सागर से पार होता है। हंस दूध और पानी को अलग करता है, और परम हंस मनमुख और गुरुमुख की पहचान रखता है।" अब तू भी परमहंस बन गया है, तू भी दूसरों को जोड़ने का काम कर रहा है। जो रूह प्यासी है, उसे भी इस ब्रह्म ज्ञान की दात देने के लिए, तूने ये कदम उठाया है कि रूह कोई प्यासी ना जाए। सबसे बड़ा उत्तम कर्म है कि दूसरों को जोड़ना। यही तो है परमहंस। हम सभी इस परमात्मा से जुड़ने के लिए सत्संग में आते हैं। सत्संग में समय से आते हैं तो काम भी समय से बनते हैं। यह आजमाया गया है। दौड़-दौड़ कर सत्संग में आए। क्योंकि हम कहीं पर पानी कुएं से निकालते हैं, कितनी बाल्टियां निकलेंगी? अगर बारिश 5 मिनट की हो जाए तो पूरे खेत को हरियाली कर देता है। इसी प्रकार ही ये सत्संग है। यहां पर जो रहमत की बारिश होती है, ये सब के मन हरे हो जाते हैं। जिसका विश्वास, जिसकी लगन लग जाती सत्संग में, तो फिर वह रुक नहीं पाता। सत्संग कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने भी गीत विचारों के माध्यम से अपने भाव प्रकट किए।

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